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लेप्टोस्पायरोसिस

Mon 03 Aug, 2026

संदर्भ

जुलाई 2026 के दौरान केवल केरल में लगभग 50 लोगों की मृत्यु होने के बाद लेप्टोस्पायरोसिस एक बार फिर भारत में गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता के रूप में उभरा है। यद्यपि यह रोग 1989 से केरल में स्थानिक (Endemic) बना हुआ है, हाल के वर्षों में इसकी तीव्र प्रगति, उच्च मृत्यु दर तथा मानसून एवं बाढ़ से बढ़ते संबंध के कारण इसने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। प्रभावी एंटीबायोटिक उपचार उपलब्ध होने के बावजूद यह रोग केरल के सबसे घातक संक्रामक रोगों में से एक बन गया है, जिससे शीघ्र निदान, समय पर उपचार तथा प्रभावी रोकथाम उपायों की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

 

लेप्टोस्पायरोसिस क्या है?

  • लेप्टोस्पायरोसिस एक जूनोटिक (पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाला) जीवाणुजनित रोग है, जो लेप्टोस्पाइरा (Leptospira) वंश के रोगजनक स्पाइरोकीट जीवाणुओं, विशेष रूप से Leptospira interrogans, के कारण होता है। यह एक प्रणालीगत (Systemic) जीवाणु संक्रमण है, जो पशुओं से मनुष्यों में फैलता है तथा पर्यावरणीय परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होता है। यह रोग मुख्यतः उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ भारी वर्षा, बाढ़ तथा खराब स्वच्छता की स्थिति होती है।
  • डेंगू या मलेरिया जैसे वाहक-जनित (Vector-borne) रोगों के विपरीत, लेप्टोस्पायरोसिस संक्रमित पशुओं, विशेषकर कृन्तकों (चूहों) के मूत्र के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संपर्क से फैलता है। यह जीवाणु दूषित जल या मिट्टी के संपर्क में आने पर त्वचा के कटे या छिले हुए भागों अथवा आँख, नाक एवं मुख की श्लेष्मा झिल्लियों (Mucous Membranes) के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है।

 

केरल इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों है?

  • केरल की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियाँ लेप्टोस्पाइरा जीवाणुओं के जीवित रहने एवं फैलने के लिए अत्यंत अनुकूल हैं।
  • भारी मानसूनी वर्षा, बार-बार आने वाली बाढ़, वर्षभर रहने वाली आर्द्रता, व्यापक धान की खेती, नहरों का विस्तृत जाल तथा चूहों की अधिक संख्या मिलकर इस रोग के प्रसार के लिए आदर्श वातावरण तैयार करते हैं।
  • कृषि श्रमिक, सफाईकर्मी, नहर सफाई कर्मचारी, अनानास बागानों के श्रमिक, निर्माण श्रमिक, डेयरी कर्मी तथा प्रवासी मजदूर अक्सर दूषित बाढ़ के पानी और कीचड़ के संपर्क में आते हैं, जिससे उनके संक्रमित होने का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
  • सड़कों के किनारे भोजनालयों (Wayside Eateries) की बढ़ती संख्या ने भी चूहों की आबादी में वृद्धि की है, जिससे पर्यावरणीय प्रदूषण और संक्रमण का खतरा बढ़ गया है।
  • हालांकि, स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि केरल में रोग का अधिक बोझ बेहतर रोग निगरानी (Disease Surveillance), उन्नत जांच सुविधाओं तथा व्यवस्थित रिपोर्टिंग का परिणाम भी है, जबकि अन्य राज्यों में अभी भी रोग की कम रिपोर्टिंग होती है।

 

संक्रमण एवं नैदानिक लक्षण (Transmission and Clinical Features)

  • चूहे इस रोग के प्रमुख Reservoir Host हैं, हालांकि गाय, भैंस, सूअर तथा कुत्ते भी इस जीवाणु को अपने शरीर में बिना बीमार हुए वहन कर सकते हैं। संक्रमित पशु अपने मूत्र के माध्यम से जीवाणुओं को बाहर निकालते हैं, जिससे जल स्रोत एवं मिट्टी दूषित हो जाते हैं।

संक्रमण के बाद ऊष्मायन अवधि (Incubation Period) सामान्यतः 2 से 30 दिन होती है, जिसके पश्चात निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं—

  • तेज बुखार
  • मांसपेशियों में तीव्र दर्द (विशेषकर पिंडलियों में)
  • सिरदर्द
  • ठंड लगना
  • आँखों का लाल होना (Conjunctival Suffusion)
  • उल्टी एवं जठरांत्र संबंधी समस्याएँ

यदि समय पर उपचार न मिले तो लगभग 5–10% रोगियों में यह रोग गंभीर अवस्था वील्स डिज़ीज़ (Weil's Disease) में परिवर्तित हो जाता है, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—

  • तीव्र गुर्दा क्षति (Acute Kidney Injury)
  • पीलिया सहित यकृत विफलता
  • फेफड़ों से रक्तस्राव (Pulmonary Haemorrhage)
  • बहु-अंग विफलता (Multi-organ Failure)
  • हृदय एवं रक्त परिसंचरण तंत्र का विफल होना

चिकित्सकों के अनुसार, पहले जहाँ गंभीर जटिलताएँ रोग के दूसरे सप्ताह में दिखाई देती थीं, वहीं अब वे 4–5 दिनों के भीतर विकसित हो रही हैं, जिससे उपचार का समय अत्यंत सीमित हो गया है।

 

निदान एवं उपचार संबंधी चुनौतियाँ (Diagnosis and Treatment Challenges)

  • इस रोग की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्रारंभिक लक्षण डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया अथवा सामान्य वायरल बुखार से मिलते-जुलते हैं। परिणामस्वरूप अधिकांश लोग दर्द निवारक दवाएँ लेकर स्वयं उपचार करने लगते हैं तथा चिकित्सक के पास देर से पहुँचते हैं।
  • ELISA जैसी सीरोलॉजिकल जांच रोग के प्रारंभिक चरण में संक्रमण की पुष्टि नहीं कर पाती। इसलिए केरल ने शीघ्र पहचान हेतु पीसीआर (Polymerase Chain Reaction) आधारित आणविक परीक्षण प्रारम्भ किए हैं, हालांकि ये सभी जिलों में उपलब्ध नहीं हैं।
  • डॉक्सीसाइक्लिन (Doxycycline) अथवा पेनिसिलिन (Penicillin) का समय पर प्रयोग अत्यंत प्रभावी माना जाता है क्योंकि ये जीवाणुओं की वृद्धि को प्रारंभिक अवस्था में ही रोक देते हैं।

 

रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु सरकारी पहल (Government Initiatives for Prevention and Control)

  • भारत ने लेप्टोस्पायरोसिस के नियंत्रण हेतु अनेक सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम अपनाए हैं।
  • एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (Integrated Disease Surveillance Programme - IDSP)
  • लेप्टोस्पायरोसिस की सक्रिय निगरानी IDSP के अंतर्गत की जाती है, जिससे मानसून के दौरान संभावित प्रकोप की शीघ्र पहचान एवं त्वरित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया सुनिश्चित की जा सके।
  • राष्ट्रीय लेप्टोस्पायरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (National Programme for Prevention and Control of Leptospirosis - NPPCL)

यह कार्यक्रम केरल, गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र सहित अन्य स्थानिक राज्यों में संचालित किया जा रहा है, जिसके प्रमुख उद्देश्य हैं—

  • शीघ्र निदान
  • निःशुल्क उपचार
  • डॉक्सीसाइक्लिन द्वारा कीमो-प्रोफिलैक्सिस
  • कृन्तक नियंत्रण
  • जन-जागरूकता
  • स्वास्थ्य कर्मियों का क्षमता निर्माण

वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण

भारत One Health Strategy के अंतर्गत निम्न संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से इस रोग का नियंत्रण करता है—

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
  • पशुपालन विभाग
  • पर्यावरण एवं स्वच्छता एजेंसियाँ

यह दृष्टिकोण इस तथ्य को स्वीकार करता है कि मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य परस्पर जुड़े हुए हैं।

केरल की रोकथाम रणनीति

  • केरल सरकार मानसून के दौरान उच्च जोखिम वाले व्यवसायों से जुड़े लोगों को सप्ताह में दो बार 200 मि.ग्रा. डॉक्सीसाइक्लिन की प्रोफिलैक्सिस प्रदान करती है।
  • राज्य सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सकों को निर्देश दिया है कि बाढ़ के पानी के संपर्क में आए बुखार एवं मांसपेशियों के दर्द वाले रोगियों में इस रोग की संभावना को प्राथमिकता दें।
  • विशेषज्ञों ने कृषि एवं सफाई कर्मियों को गमबूट, भारी दस्ताने जैसे सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने तथा व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की भी सिफारिश की है।

 

महत्त्व (Significance)

  • लेप्टोस्पायरोसिस यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन, शहरी बाढ़, पर्यावरणीय स्वच्छता, व्यावसायिक स्वास्थ्य तथा जूनोटिक रोग किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
  • अत्यधिक वर्षा एवं बाढ़ की बढ़ती घटनाएँ भविष्य में इस रोग के प्रसार को और बढ़ा सकती हैं।
  • मृत्यु दर कम करने के लिए प्रयोगशाला सुविधाओं का विस्तार, शीघ्र निदान, आणविक परीक्षणों की उपलब्धता तथा निवारक व्यवहारों को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक होगा।

 

निष्कर्ष (Conclusion)

  • लेप्टोस्पायरोसिस भारत के सबसे महत्वपूर्ण मानसून-जनित सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों में से एक बन चुका है। यद्यपि इसका समय पर एंटीबायोटिक उपचार पूरी तरह संभव है, फिर भी विलंबित निदान के कारण अनेक लोगों की मृत्यु हो रही है।
  • इस रोग पर प्रभावी नियंत्रण के लिए मजबूत रोग निगरानी, पर्यावरणीय स्वच्छता, कृन्तक नियंत्रण, व्यावसायिक सुरक्षा तथा जन-जागरूकता को वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण के अंतर्गत एकीकृत रूप से लागू करना आवश्यक होगा, जिससे मानव, पशु एवं पर्यावरण—तीनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

जीवाणुजनित रोग (Bacterial Diseases)

रोग (Disease) कारक जीवाणु (Causative Bacterium)
तपेदिक (Tuberculosis - TB) Mycobacterium tuberculosis
टाइफाइड Salmonella Typhi
हैजा (Cholera) Vibrio cholerae
प्लेग Yersinia pestis
डिप्थीरिया Corynebacterium diphtheriae
टेटनस Clostridium tetani
काली खाँसी (Pertussis) Bordetella pertussis
जीवाणुजनित निमोनिया Streptococcus pneumoniae
सूजाक (Gonorrhoea) Neisseria gonorrhoeae
उपदंश (Syphilis) Treponema pallidum
कुष्ठ रोग (Leprosy / Hansen's Disease) Mycobacterium leprae
एन्थ्रेक्स Bacillus anthracis
बोटुलिज़्म Clostridium botulinum
गैस गैंग्रीन Clostridium perfringens
बैसिलरी पेचिश Shigella dysenteriae
मेनिंगोकोकल मेनिन्जाइटिस Neisseria meningitidis
लाइम रोग Borrelia burgdorferi
स्क्रब टाइफस Orientia tsutsugamushi
ब्रुसेलोसिस Brucella abortus / Brucella melitensis

 

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