28 July, 2026
लोक परीक्षाएँ (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2026
Sun 02 Aug, 2026
संदर्भ
भारतीय संसद द्वारा लोक परीक्षाएँ (अनुचित साधनों की रोकथाम) (संशोधन) अधिनियम, 2026 पारित किया गया, जिसे 31 जुलाई 2026 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इस संशोधन के माध्यम से मूल अधिनियम को अधिक सशक्त बनाया गया है, जिसमें कठोर दंड, जाँच एवं न्यायिक प्रक्रिया के लिए अनिवार्य समय-सीमा, विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना तथा प्रवर्तन संबंधी कड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं।
पृष्ठभूमि (Background)
- लोक परीक्षाएँ (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 भारत की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता बनाए रखने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। इसका उद्देश्य प्रश्नपत्र लीक, प्रतिरूपण (Impersonation), संगठित नकल गिरोह तथा डिजिटल माध्यमों से परीक्षा में हेरफेर जैसी कदाचारपूर्ण गतिविधियों पर रोक लगाना था। किन्तु नीट-यूजी (NEET-UG) 2026 प्रश्नपत्र लीक प्रकरण, जिससे लगभग 22 लाख अभ्यर्थी प्रभावित हुए, ने इस अधिनियम के क्रियान्वयन की गंभीर कमियों को उजागर किया। परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होने के कारण परीक्षा निरस्त करनी पड़ी, जिसके परिणामस्वरूप देशव्यापी विरोध प्रदर्शन, न्यायिक हस्तक्षेप तथा अधिक कठोर विधायी प्रावधानों की आवश्यकता अनुभव की गई।
- भारत में प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA), संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRBs) तथा इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सोनल सिलेक्शन (IBPS) जैसी संस्थाओं द्वारा अनेक उच्च-स्तरीय सार्वजनिक परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। ये परीक्षाएँ प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश एवं सरकारी सेवाओं में भर्ती का आधार होती हैं, इसलिए इनकी पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं योग्यता-आधारित चयन संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- विधायी सुधार का तात्कालिक कारण NEET-UG 2024 का प्रश्नपत्र लीक प्रकरण था, जिसमें बिहार के पटना तथा झारखंड के हज़ारीबाग में प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आए।
- विवाद तब और गहरा गया जब 67 अभ्यर्थियों ने पूर्ण अंक प्राप्त किए, जिनमें विवादित ग्रेस मार्क्स पाने वाले अभ्यर्थी भी शामिल थे। इसके पश्चात केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जाँच में विभिन्न राज्यों में सक्रिय संगठित परीक्षा धोखाधड़ी गिरोहों का खुलासा हुआ।
- यद्यपि इन चुनौतियों से निपटने हेतु लोक परीक्षाएँ (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया गया था, किन्तु NEET-UG 2026 में पुनः बड़े स्तर पर प्रश्नपत्र लीक की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि अधिक प्रभावी संस्थागत तंत्र तथा कठोर जवाबदेही आवश्यक है।
अधिनियम के उद्देश्य (Objectives of the Act)
- अधिनियम का उद्देश्य भर्ती परीक्षाओं एवं प्रवेश परीक्षाओं को पारदर्शी, निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा योग्यता-आधारित बनाना है।
- इसका उद्देश्य संगठित परीक्षा धोखाधड़ी को समाप्त करना, प्रश्नपत्र लीक गिरोहों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक व्यवस्था स्थापित करना, योग्य अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करना तथा सार्वजनिक परीक्षाओं में जनविश्वास को पुनर्स्थापित करना है।
- 2026 के संशोधन के माध्यम से विधिक रूप से लागू होने वाला पाँच माह का न्यायिक ढाँचा (Five-Month Justice Framework) प्रस्तुत किया गया है, जिसमें दो माह की जाँच अवधि तथा तीन माह की न्यायिक सुनवाई का प्रावधान किया गया है, जिससे मुकदमों में अनावश्यक विलंब रोका जा सके।
2026 संशोधन के प्रमुख प्रावधान (Major Provisions of the 2026 Amendment)
- संशोधन अधिनियम ने समयबद्ध जाँच तथा त्वरित न्यायिक प्रक्रिया को अनिवार्य बनाकर 2024 के अधिनियम को अधिक प्रभावी बनाया है। राज्य पुलिस, केंद्रीय जाँच एजेंसियों अथवा विशेष कार्यबल (STF) द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने के 60 दिनों के भीतर जाँच पूर्ण करना अनिवार्य होगा। इसके पश्चात नामित विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालयों को आरोप-पत्र दाखिल होने के तीन माह के भीतर सुनवाई पूरी करनी होगी। उच्च न्यायालयों में दायर अपीलों का भी सीमित अवधि में निस्तारण अपेक्षित है।
- संशोधन द्वारा दंड प्रावधानों को भी अत्यधिक कठोर बनाया गया है। परीक्षा कदाचार में संलिप्त व्यक्तियों के लिए कारावास की अवधि 3–5 वर्ष से बढ़ाकर 5–10 वर्ष तथा अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख कर दिया गया है। परीक्षा सेवा प्रदाताओं पर लगाया जाने वाला जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ तथा परीक्षा प्रतिबंध (Debarment) की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष कर दी गई है। संगठित परीक्षा धोखाधड़ी गिरोहों के लिए 7 से 10 वर्ष तक का कारावास, ₹10 करोड़ तक का जुर्माना तथा राज्य को हुए नुकसान की भरपाई हेतु दोषियों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान किया गया है।
- अधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार को अंतरराज्यीय परीक्षा धोखाधड़ी गिरोहों की जाँच हेतु विशेष कार्यबल (STF) गठित करने का अधिकार प्रदान किया गया है। साथ ही सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालय स्थापित करने तथा ऐसे मामलों के लिए विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति करना अनिवार्य किया गया है।
अधिनियम के अंतर्गत शामिल अपराध (Offences Covered)
- अधिनियम में परीक्षा संबंधी 15 प्रकार के अपराधों को शामिल किया गया है, जिन्हें संज्ञेय (Cognizable), गैर-जमानती (Non-Bailable) तथा गैर-समझौतायोग्य (Non-Compoundable) घोषित किया गया है।
- इनमें प्रश्नपत्र अथवा उत्तर-कुंजी का लीक होना, OMR शीट अथवा परीक्षा सामग्री का अनधिकृत कब्ज़ा, कंप्यूटर नेटवर्क अथवा परीक्षा सर्वर में छेड़छाड़, बैठने की व्यवस्था में हेरफेर, प्रतिरूपण (Impersonation), फर्जी प्रवेश-पत्र, फर्जी वेबसाइट, फर्जी नियुक्ति-पत्र तैयार करना तथा अन्य संगठित परीक्षा धोखाधड़ी गतिविधियाँ शामिल हैं।
तुलना : 2024 अधिनियम बनाम 2026 संशोधन
| श्रेणी | 2024 अधिनियम | 2026 संशोधन |
| व्यक्ति | 3–5 वर्ष कारावास + ₹10 लाख तक जुर्माना | 5–10 वर्ष कारावास + ₹50 लाख तक जुर्माना |
| सेवा प्रदाता | ₹1 करोड़ तक जुर्माना + 4 वर्ष प्रतिबंध | ₹5 करोड़ तक जुर्माना + 8 वर्ष प्रतिबंध |
| संगठित अपराध | न्यूनतम 5 वर्ष कारावास + ₹1 करोड़ तक जुर्माना | न्यूनतम 7 वर्ष कारावास + ₹10 करोड़ तक जुर्माना |
| जाँच | कोई वैधानिक समय-सीमा नहीं | 60 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से पूर्ण |
| न्यायिक सुनवाई | कोई निश्चित समय-सीमा नहीं | आरोप-पत्र दाखिल होने के 3 माह के भीतर अनिवार्य रूप से पूर्ण |
संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)
यह अधिनियम भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों से वैधानिक आधार प्राप्त करता है।
- अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है तथा परीक्षा धोखाधड़ी के कारण योग्य अभ्यर्थियों के साथ होने वाले अन्याय से उनकी रक्षा करता है।
- अनुच्छेद 21 की व्यापक न्यायिक व्याख्या के अनुसार प्रत्येक नागरिक को भ्रष्टाचार-मुक्त एवं निष्पक्ष शिक्षा तथा रोजगार के अवसर प्राप्त करने का अधिकार है।
- संसद को इस विषय पर विधि बनाने की शक्ति संघ सूची की प्रविष्टि 65 (संघ लोक सेवाएँ एवं अखिल भारतीय सेवाएँ) तथा समवर्ती सूची की प्रविष्टि 25 (शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण) से प्राप्त होती है।
चुनौतियाँ एवं आलोचना (Challenges and Criticism)
- कठोर समय-सीमा निर्धारित किए जाने के बावजूद इस संशोधन की विधि विशेषज्ञों तथा PRS Legislative Research द्वारा आलोचना की गई है।
- अधिनियम में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि जाँच एजेंसियाँ निर्धारित दो माह की अवधि में जाँच पूर्ण नहीं कर पाती हैं तो उनके विरुद्ध कौन-सी जवाबदेही तय होगी।
- लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के विपरीत इस अधिनियम में जाँच अधिकारियों के लिए विलंब के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य नहीं किया गया है।
- इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 में अपने निर्णय में कहा था कि आपराधिक मामलों के निस्तारण हेतु कठोर समय-सीमा निर्धारित करना प्रत्येक मामले में व्यावहारिक अथवा न्यायसंगत नहीं हो सकता।
- वर्तमान फास्ट ट्रैक न्यायालय भी लंबित मामलों के अत्यधिक बोझ, न्यायाधीशों की कमी, अपर्याप्त आधारभूत संरचना, बार-बार स्थगन, अभियुक्तों की अनुपस्थिति तथा सरकारी गवाहों की अनुपलब्धता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिससे प्रस्तावित समय-सीमा के प्रभावी क्रियान्वयन पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
- लोक परीक्षाएँ (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024, जिसे 2026 के संशोधन द्वारा और अधिक सशक्त बनाया गया है, परीक्षा धोखाधड़ी के विरुद्ध भारत का अब तक का सबसे व्यापक विधिक ढाँचा है। कठोर दंड, समयबद्ध जाँच, विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालय तथा प्रभावी प्रवर्तन व्यवस्था के माध्यम से यह अधिनियम सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता एवं योग्यता-आधारित चयन प्रणाली को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करता है।
- तथापि, इस कानून की वास्तविक सफलता केवल कठोर दंड पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि प्रभावी जाँच, संस्थागत जवाबदेही, न्यायिक क्षमता, तकनीकी सुरक्षा उपायों तथा पारदर्शी परीक्षा प्रशासन पर भी समान रूप से निर्भर करेगी।
- दीर्घकाल में कठोर विधिक प्रवर्तन तथा व्यापक प्रशासनिक सुधारों का संतुलित समन्वय ही भारत की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में जनविश्वास को पुनर्स्थापित कर सकेगा।









