27 July, 2026
अमेरिका का सऊदी से परमाणु समझौता
Fri 24 Jul, 2026
संदर्भ :
- अमेरिका और सऊदी अरब ने ऐतिहासिक 30-वर्षीय नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किया।
मुख्य बिन्दु :
- समझौते का मुख्य उद्देश्य : सऊदी अरब के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को विकसित करने में अमेरिकी प्रौद्योगिकी, कंपनियों और विशेषज्ञता का उपयोग करना
- हस्ताक्षर तिथि : 22 जुलाई 2026
- समझौते की अवधि : 30 वर्ष
- समझौते के तहत अमेरिका, सऊदी अरब को असैन्य (बिजली बनाने के लिए) परमाणु तकनीक देगा
- कानूनी ढांचा : अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1954 की धारा 123 (Section 123 Agreement)
- हस्ताक्षरकर्ता : क्रिस राइट (अमेरिकी ऊर्जा सचिव) एवं राजकुमार अब्दुलअजीज बिन सलमान (सऊदी ऊर्जा मंत्री)
- अब्राहम समझौते से जुड़ाव की शर्त: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि सऊदी अरब इज़राइल के साथ राजनयिक संबंध सामान्य करने (अब्राहम समझौते में शामिल होने) के लिए तैयार हो
समझौते के प्रमुख प्रावधान :
- प्रौद्योगिकी एवं सामग्री का हस्तांतरण: अमेरिका सऊदी अरब को परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण हेतु आवश्यक प्रौद्योगिकी, रिएक्टर तकनीक और उपकरण उपलब्ध कराएगा
- यूरेनियम संवर्धन : समझौते में सऊदी अरब की भूमि पर अमेरिकी सहयोग से निर्मित सुविधा में यूरेनियम संवर्धन का मार्ग प्रशस्त करने पर अध्ययन शामिल है।
- अधिनियम 123 के तहत वैधानिक ढांचा: अमेरिकी कानून के तहत किसी भी देश को परमाणु प्रौद्योगिकी बेचने या हस्तांतरित करने के लिए "धारा 123" के तहत समझौता करना अनिवार्य होता है।
रणनीतिक एवं भू-राजनीतिक महत्व :
- ऊर्जा विविधीकरण (Vision 2030): सऊदी अरब अपने आर्थिक मॉडल 'विजन 2030' के तहत तेल पर निर्भरता कम करना चाहता है। परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा कर सऊदी अरब अपने कच्चे तेल की घरेलू खपत घटाएगा, जिससे वह अधिक तेल निर्यात कर सकेगा।
- चीन और रूस को बाहर रखना: यदि अमेरिका यह समझौता नहीं करता, तो सऊदी अरब रूस (Rosatom) या चीन (CNNC) की ओर रुख कर सकता था। इस सौदे से पश्चिम एशिया में अमेरिका का रणनीतिक दबदबा बना रहेगा।
- पश्चिम एशिया का शक्ति संतुलन: इस समझौते से क्षेत्र में ईरान के परमाणु प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिलेगी, हालांकि इससे क्षेत्रीय संतुलन को लेकर नई चिंताएं भी उपजी हैं।
- अब्राहम समझौता : अमेरिकी प्रशासन इस परमाणु समझौते को सऊदी अरब और इज़राइल के बीच राजनयिक संबंधों के सामान्यीकरण से भी जोड़कर देख रहा है।
प्रमुख चिंताएं एवं विवाद :
- अमेरिका अब तक 26 देशों के साथ ऐसा समझौता कर चुका है। भारत के साथ अमेरिका ने 2008 में परमाणु समझौता किया था।
- अमेरिका गैर-परमाणु देशों के साथ समझौता करते समय शर्त रखता है कि वे देश यूरेनियम संवर्धन खुद नहीं करेंगे, लेकिन इस समझौते में यह शर्त नहीं है।
- सऊदी अरब में यूरेनियम के भंडार मौजूद हैं। अगर उसे यूरेनियम संवर्धन की इजाजत मिलती है, तो वह आगे परमाणु ईंधन तैयार कर सकेगा।
- सऊदी अरब का मकसद 2030 तक अपनी बिजली का बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा से पैदा करना है, ताकि तेल पर निर्भरता कम हो।
- वर्ष 2009 में अमेरिका ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ 123 समझौता किया था, जिसमें UAE ने यूरेनियम संवर्धन और प्रयुक्त ईंधन के पुनर्संस्करण का अधिकार स्पष्ट रूप से त्याग दिया था (इसे 'गोल्ड स्टैंडर्ड' कहा जाता है)।
- सऊदी अरब के साथ हुए समझौते में संवर्धन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, जो अप्रसार विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है।
अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) :
- स्थापना: 29 जुलाई 1957 (अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर के "एटम्स फॉर पीस" भाषण के परिणामस्वरूप)
- मुख्यालय: वियना, ऑस्ट्रिया
- सदस्य देश: वर्तमान में 178 से अधिक सदस्य (भारत इसका एक संस्थापक सदस्य है)।
- वैश्विक थीम/आदर्श वाक्य: "शांति और विकास के लिए परमाणु"
- पुरस्कार: वर्ष 2005 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित
संयुक्त राष्ट्र (UN) के साथ संबंध :
- IAEA संयुक्त राष्ट्र संघ के तहत एक स्वायत्त निकाय है।
- यह संयुक्त राष्ट्र की कोई नियमित "विशेष एजेंसी" नहीं है, बल्कि अपनी स्वयं की अंतर्राष्ट्रीय संधि (IAEA संविधि) द्वारा शासित होती है।
- यह अपनी रिपोर्ट सीधे संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) दोनों को सौंपती है
भारत और IAEA :
- संस्थापक सदस्य: भारत 1957 से ही इसका सक्रिय सदस्य रहा है।
- NPT और सुरक्षा उपाय: भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जिसके कारण भारत के सभी परमाणु संयंत्र IAEA के अधीन नहीं आते हैं।
- भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (2008): इस समझौते के बाद, भारत ने IAEA के साथ एक 'भारत-विशिष्ट सुरक्षा समझौता' किया था। इसके तहत भारत अपने नागरिक परमाणु रिएक्टरों को स्वेच्छा से IAEA की निगरानी और निरीक्षण के दायरे में रखता है, जबकि सैन्य रिएक्टर इसके दायरे से बाहर हैं
परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty - NPT) :
- हस्ताक्षर के लिए खुला: 1 जुलाई 1968
- लागू होने की तिथि: 5 मार्च 1970
- कुल सदस्य देश: वर्तमान में 191 देश इसके सदस्य हैं।
- अवधि: 1995 में इसे अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया गया
- निगरानी संस्था: अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) इसके नियमों के अनुपालन की जांच करती है।
- भारत, पाकिस्तान, इज़राइल और उत्तर कोरिया NPT के हस्ताक्षरकर्ता सदस्य नहीं हैं। सऊदी अरब NPT का सदस्य है।









