22 July, 2026
UCC विधेयक, 2026' : मध्य प्रदेश
Tue 21 Jul, 2026
संदर्भ :
- मध्य प्रदेश विधानसभा ने 'समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026' को ध्वनि मत से पारित किया।
मुख्य बिन्दु :
- समिति का गठन: इस विधेयक का प्रारूप जस्टिस (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई (सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश) की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है।
- जनभागीदारी: प्रारूप तैयार करने से पहले व्यापक जनसंवाद किया गया, जिसमें लगभग 9.5 लाख से अधिक सुझाव प्राप्त हुए
- इसमें बहुविवाह एवं निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने के साथ-साथ लिव-इन संबंधों के संबंध में कठोर प्रावधान किए गए हैं।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान :
- बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध: राज्य में अब कोई भी व्यक्ति एक से अधिक विवाह नहीं कर सकेगा
- विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण: सभी धर्मों के लिए विवाह और तलाक का रजिस्ट्रेशन ग्रामीण स्तर तक अनिवार्य होगा।
- लिव-इन रिलेशनशिप का नियम: लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को एक महीने के भीतर अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा।
- आदिवासी समुदाय को छूट: मध्य प्रदेश की बड़ी जनजातीय आबादी की अनूठी संस्कृति को देखते हुए आदिवासी समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
- कुप्रथाओं पर रोक: तीन तलाक और 'निकाह हलाला' जैसी प्रथाओं को प्रतिबंधित और अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है।
- आयु सीमा: विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष निर्धारित है।
उत्तराधिकार और संपत्ति अधिकार :
- लैंगिक समानता: बेटे और बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान वंशानुगत अधिकार प्राप्त होंगे।
- 'अवैध संतान' शब्द की समाप्ति: कानूनी ढांचे से 'इल्लेजिटिमेस' (अवैध संतान) शब्द को हटा दिया गया है। जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या ART से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी और संपत्ति अधिकार मिलेंगे।
अनुसूचित जनजातियों (ST) को विशेष छूट :
- सांस्कृतिक संरक्षण: संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 के तहत आने वाली मध्य प्रदेश की विशाल जनजातीय आबादी (जैसे- भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया) को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है ताकि उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक और पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित न हो।
- इसके अलावा, संविधान के भाग XXI के तहत संरक्षित समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को भी छूट दी गई है।
समान नागरिक संहिता (UCC) :
- पूरे देश के लिए एक समान नागरिक कानून से है, जो विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत (पर्सनल) मामलों में सभी धार्मिक समुदायों पर समान रूप से लागू होता है।
संवैधानिक प्रावधान :
- अनुच्छेद 44 (भाग IV): यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के अंतर्गत आता है। इसके अनुसार, "राज्य भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करेगा"
- प्रकृति: नीति निदेशक तत्व होने के कारण यह न्यायालय द्वारा कानूनी रूप से प्रवर्तनीय नहीं है, बल्कि शासन के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है
अन्य संबंधित अनुच्छेद:
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता
- अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद 21: गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार
- अनुच्छेद 25-28: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (जो UCC के विरोधियों का मुख्य आधार है)
- अनुच्छेद-342: राष्ट्रपति को अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद-366(25): अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक परिभाषा प्रदान करता है।
भारत में वर्तमान स्थिति :
- गोवा : यह भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां पुर्तगाली शासन के समय से ही (गोवा नागरिक संहिता, 1867) के तहत समान नागरिक कानून लागू है। आजादी के बाद भी इसे बरकरार रखा गया।
- उत्तराखंड : स्वतंत्रता के बाद विधानसभा से बकायदा कानून बनाकर UCC लागू करने वाला देश का पहला राज्य है। यहां 27 जनवरी 2025 से यह कानून पूरी तरह प्रभावी हो चुका है
- गुजरात : 24-25 मार्च 2026 को अपनी विधानसभा से 'समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026' पारित करने वाला देश का दूसरा राज्य बना।
- असम : मई 2026 में अपनी विधानसभा से UCC विधेयक पारित करने वाला देश का तीसरा और पूर्वोत्तर (North East) का पहला राज्य बना।
- मध्य प्रदेश : 21 जुलाई 2026 को ध्वनि मत से अपनी विधानसभा में UCC विधेयक पारित करने वाला देश का चौथा राज्य बन गया है।
- विधि आयोग का रुख: 21वें विधि आयोग (2018) ने कहा था कि इस चरण में यूसीसी "न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय", जबकि 22वें विधि आयोग ने इस पर सार्वजनिक और धार्मिक संगठनों से नए सिरे से विचार मांगे हैं
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय :
- शाह बानो मामला (1985): इस ऐतिहासिक केस में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि देश की अखंडता, राष्ट्रीय एकता और महिलाओं को समान न्याय दिलाने के लिए 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' एक आवश्यक कदम है।
- सरला मुद्गल केस (1995): शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि सिर्फ दूसरी शादी रचाने के इरादे से धर्म बदलना कानूनी रूप से गलत है। कोर्ट ने देश में समान नागरिक कानून की कमी को इस विसंगति की मुख्य वजह माना।
- जॉन वल्लामट्टोम वाद (2003): सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि समान नागरिक कानून लागू न होने से पारिवारिक और नागरिक मामलों में भेदभाव बढ़ता है, जिससे देश के एकीकरण की राह में बाधा आती है।
- शायरा बानो केस (2017): सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने एक साथ तीन बार तलाक बोलने की प्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) को पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक करार दिया।
- जोसेफ शाइन मामला (2018): इस वाद में अदालत ने शादीशुदा रिश्तों के भीतर महिलाओं के आत्मसम्मान, निजी स्वतंत्रता और बराबरी के अधिकारों को अक्षुण्ण रखने की पैरवी की।









