22 July, 2026
WTO मत्स्य पालन सब्सिडी (Fisheries Subsidies) समझौता
Mon 20 Jul, 2026
संदर्भ
- भारत ने 20 जुलाई 2026 को अपना स्वीकृति-पत्र (Instrument of Acceptance) जमा कर विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते का आधिकारिक पक्षकार (Party) बनने का दर्जा प्राप्त किया। इसके साथ ही भारत इस समझौते को स्वीकार करने वाला WTO का 123वाँ सदस्य देश बन गया।
WTO मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता क्या है?
- WTO मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के माध्यम से पर्यावरणीय सततता (Environmental Sustainability) को बढ़ावा देने हेतु बनाया गया विश्व का पहला बहुपक्षीय व्यापार समझौता है। इसे लगभग दो दशकों तक चली वार्ताओं के पश्चात जून 2022 में जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में आयोजित WTO के 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC12) में अपनाया गया।
- यह समझौता सतत विकास लक्ष्य (SDG)-14.6 की प्राप्ति में भी प्रत्यक्ष योगदान देता है, जिसका उद्देश्य अत्यक्षमता (Overcapacity), अतिमत्स्यन (Overfishing) तथा अवैध, अप्रतिवेदित एवं अनियमित (Illegal, Unreported and Unregulated-IUU) मत्स्यन को बढ़ावा देने वाली हानिकारक सब्सिडियों पर प्रतिबंध लगाना है।
समझौते के प्रमुख प्रावधान
- यह समझौता समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मत्स्य पालन सब्सिडियों पर व्यापक अनुशासन (Disciplines) लागू करता है। इसके अंतर्गत सरकारों को अवैध, अप्रतिवेदित एवं अनियमित (IUU) मत्स्यन में संलग्न जहाजों अथवा संचालकों को सब्सिडी प्रदान करने से प्रतिबंधित किया गया है, जिससे वैश्विक मत्स्य शासन (Global Fisheries Governance) को सुदृढ़ किया जा सके तथा समुद्री संसाधनों के अवैध दोहन को रोका जा सके।
- समझौते का एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रावधान अतिदोहित (Overfished) मत्स्य भंडार से संबंधित मत्स्यन गतिविधियों के लिए दी जाने वाली सब्सिडियों पर प्रतिबंध लगाता है, जब तक कि वह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मत्स्य भंडार पुनर्स्थापन (Stock Recovery) कार्यक्रम का हिस्सा न हो। साथ ही यह समझौता अत्यक्षमता एवं अतिमत्स्यन को बढ़ावा देने वाली सब्सिडियों को भी प्रतिबंधित करता है, विशेषकर तब जब सरकारी सहायता के कारण मत्स्य बेड़ों (Fishing Fleets) का अस्थिर विस्तार होता हो।
- इसके अतिरिक्त, यह समझौता WTO सदस्य देशों को अपने मत्स्य पालन सब्सिडी कार्यक्रमों एवं मत्स्य संसाधन प्रबंधन से संबंधित जानकारी WTO को अधिसूचित (Notify) करने के लिए बाध्य करता है, जिससे वैश्विक स्तर पर निगरानी, पारदर्शिता एवं अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
चरण-II (Phase-II) वार्ताओं के दौरान भारत की स्थिति
- यद्यपि भारत ने अब इस समझौते का अनुमोदन कर दिया है, फिर भी उसका लगातार यह मत रहा है कि वर्तमान वैश्विक मत्स्य पालन सब्सिडी व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से बड़े औद्योगिक मत्स्य बेड़ों को भारी वित्तीय सहायता प्रदान करने वाले विकसित देशों के पक्ष में अधिक झुकी हुई है।
- इसलिए भारत ने विकासशील देशों के लिए 25 वर्ष की संक्रमण अवधि (Transition Period) की मांग की है, ताकि वे अपने घरेलू मत्स्य क्षेत्र को नई सब्सिडी व्यवस्थाओं के अनुरूप धीरे-धीरे ढाल सकें और इससे मत्स्य समुदायों की आजीविका प्रभावित न हो।
- भारत ने दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों (Distant-Water) में संचालित औद्योगिक मत्स्य बेड़ों पर अधिक कठोर प्रतिबंध लगाने की भी वकालत की है, क्योंकि इनका संचालन मुख्यतः विकसित देशों द्वारा किया जाता है तथा वैश्विक समुद्री संसाधनों के अत्यधिक दोहन में इनकी प्रमुख भूमिका है। साथ ही भारत ने लघु, पारंपरिक एवं कारीगर (Artisanal) मछुआरों के लिए स्थायी छूट (Permanent Carve-out) की मांग की है, क्योंकि उनकी मत्स्यन गतिविधियाँ पर्यावरण की दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक सतत हैं तथा खाद्य सुरक्षा, तटीय आजीविका एवं ग्रामीण रोजगार के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
- भारत का मानना है कि वैश्विक मत्स्य शासन में विकासात्मक समानता (Developmental Equity) मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए तथा विभिन्न स्तर के औद्योगिकीकरण वाले देशों पर समान दायित्व नहीं लगाए जाने चाहिए।
भारत के मत्स्य क्षेत्र की स्थिति
- भारत विश्व के सबसे बड़े मत्स्य उत्पादक देशों में से एक है तथा इसका मत्स्य क्षेत्र लाखों तटीय एवं अंतर्देशीय मछुआरा समुदायों की आजीविका का आधार होने के साथ-साथ कृषि निर्यात, पोषण सुरक्षा एवं ग्रामीण रोजगार में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- भारत सरकार ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि भारत द्वारा प्रदान की जाने वाली मत्स्य पालन सब्सिडी विश्व में सबसे कम सब्सिडियों में से एक है, जो औसतन प्रति मछुआरा परिवार लगभग 15 अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष है। यह विकसित देशों द्वारा प्रदान की जाने वाली सब्सिडियों की तुलना में अत्यंत कम है।
- कई औद्योगिक मत्स्य देशों के विपरीत भारत का मत्स्य क्षेत्र मुख्यतः लघु एवं पारंपरिक मछुआरों पर आधारित है, जो सीमित पूंजी, छोटे यंत्रीकृत अथवा गैर-यंत्रीकृत नौकाओं तथा तटीय क्षेत्रों में मत्स्यन गतिविधियाँ संचालित करते हैं। इसलिए भारत का तर्क है कि उसकी सब्सिडियाँ व्यापार-विकृत (Trade Distorting) न होकर आजीविका उन्मुख (Livelihood-Oriented) हैं।
समझौते का महत्त्व
- WTO मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून एवं पर्यावरणीय शासन (Environmental Governance) के बीच एक महत्वपूर्ण समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है।
- हानिकारक सब्सिडियों को हतोत्साहित करके यह समझौता क्षीण हो चुके मत्स्य भंडारों की पुनर्बहाली, समुद्री जैव विविधता के संरक्षण तथा महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र की दीर्घकालिक सततता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।
- हालांकि भारत जैसे विकासशील देशों के लिए पर्यावरणीय सततता एवं विकासात्मक प्राथमिकताओं के मध्य संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। मत्स्य क्षेत्र रोजगार, पोषण सुरक्षा एवं विदेशी मुद्रा अर्जन का महत्वपूर्ण स्रोत है।
- इसलिए भारत साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (Common but Differentiated Responsibilities-CBDR) जैसी विकासात्मक समानता के सिद्धांत पर बल देता है तथा यह तर्क देता है कि ऐतिहासिक रूप से अतिमत्स्यन के लिए जिम्मेदार देशों पर अपेक्षाकृत अधिक दायित्व होना चाहिए।
- इस समझौते का सफल क्रियान्वयन वैज्ञानिक मत्स्य प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, अधिक पारदर्शिता, उन्नत तकनीकी निगरानी तथा विकासशील देशों के साथ न्यायसंगत व्यवहार पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष
- WTO मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते में भारत की भागीदारी सतत समुद्री संसाधन प्रबंधन एवं उत्तरदायी बहुपक्षवाद (Responsible Multilateralism) के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- साथ ही, चरण-II वार्ताओं में भारत का सतत प्रयास यह सुनिश्चित करता है कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में निष्पक्षता बनाए रखते हुए करोड़ों पारंपरिक मछुआरों के आजीविका हितों की रक्षा की जा सके।
- भविष्य में समुद्री संरक्षण, आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय के मध्य संतुलन स्थापित करना ही इस ऐतिहासिक WTO समझौते की दीर्घकालिक सफलता का आधार बनेगा।
विश्व व्यापार संगठन (WTO)
| स्थापना | 1 जनवरी 1995 |
| प्रतिस्थापित संगठन | सामान्य शुल्क एवं व्यापार समझौता (GATT), 1947 |
| मुख्यालय | जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड |
| वर्तमान महानिदेशक | डॉ. न्गोज़ी ओकोंजो-इवेला (नाइजीरिया) |
| कुल सदस्य | 166 सदस्य (2026 तक) |
| भारत की सदस्यता | संस्थापक सदस्य (1995) |
| प्रमुख समझौते | GATT, GATS, TRIPS, कृषि समझौता (Agreement on Agriculture), मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता आदि |
भारत के मत्स्य क्षेत्र की प्रमुख पहलें
| पहल | प्रारंभ वर्ष | मंत्रालय/एजेंसी |
| प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) | 2020 | मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय |
| ब्लू रिवोल्यूशन योजना (मत्स्य पालन का समेकित विकास एवं प्रबंधन) | 2015 | मत्स्य पालन विभाग |
| मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि (FIDF) | 2018 | मत्स्य पालन विभाग |
| मछुआरों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) | 2018 (2020 में मछुआरों एवं मत्स्य कृषकों तक विस्तार) | भारत सरकार |
| ई-गोपाला ऐप (मत्स्य सेवाओं के एकीकरण सहित) | 2020 | पशुपालन एवं डेयरी विभाग |
| राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म (NFDP) | 2024 | मत्स्य पालन विभाग |
| सागरमाला कार्यक्रम | 2015 | पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय |
| मत्स्य बंदरगाह एवं फिश लैंडिंग सेंटर विकास योजना | 2020 (PMMSY के अंतर्गत) | मत्स्य पालन विभाग |
| सागर परिक्रमा पहल | 2022 | मत्स्य पालन विभाग |
| प्रधानमंत्री किसान सम्पदा योजना (समुद्री खाद्य प्रसंस्करण सहायता) | 2017 | खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय |
| अलंकरण (ऑर्नामेंटल) मत्स्य विकास कार्यक्रम | 2020 (PMMSY के अंतर्गत प्रोत्साहित) | मत्स्य पालन विभाग |
| एकीकृत एक्वा पार्क (PMMSY के अंतर्गत प्रस्तावित/राज्य समर्थित) | 2024 से | आगे मत्स्य पालन विभाग एवं राज्य सरकारें |









