26 May, 2026
बॉन जलवायु सम्मेलन 2026 (SB64)
Thu 11 Jun, 2026
संदर्भ :
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत आयोजित होने वाली वार्षिक मध्य-वर्षीय तकनीकी वार्ता बॉन जलवायु सम्मेलन 2026 (SB64) का आयोजन जर्मनी के बॉन शहर में किया जा रहा है।
मुख्य बिन्दु :
- औपचारिक नाम: संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के सहायक निकायों का 64वां सत्र (SB64 - 64th Sessions of the Subsidiary Bodies)
- आयोजन स्थल: वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस सेंटर, बॉन, जर्मनी
- महत्व: यह पिछले साल नवंबर में ब्राजील के बेलेम में आयोजित COP30 के बाद पहला बड़ा बहुपक्षीय जलवायु सम्मेलन है। इसे आगामी COP31 (ऑस्ट्रेलिया और तुर्किये संयुक्त रूप से) के लिए एक 'तैयारी पुल' माना जा रहा है
प्रमुख एजेंडा और चर्चा के विषय :
- अनुकूलन वित्त में वृद्धि: विभिन्न स्वास्थ्य और जलवायु संगठनों ने मांग की है कि प्रभावित विकासशील देशों की मदद के लिए सार्वजनिक अनुकूलन वित्त को वर्ष 2035 तक बढ़ाकर कम से कम $120 अरब वार्षिक किया जाए।
- जीवाश्म ईंधन से दूरी : COP28 और COP30 के निर्णयों को आगे बढ़ाते हुए वैश्विक ऊर्जा प्रणालियों को स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर स्थानांतरित करने पर जोर दिया गया।
- बाकू-टू-बेलेम रोडमैप : विकासशील देशों में जलवायु कार्यों के लिए वित्त को बढ़ाकर कम से कम $1.3 ट्रिलियन प्रति वर्ष करने के रोडमैप के वास्तविक क्रियान्वयन पर चर्चा हुई।
- बेलेम एडाप्टेशन इंडिकेटर्स: COP30 में अपनाए गए 59 अनुकूलन संकेतकों को धरातल पर उतारने के लिए तकनीकी बातचीत शुरू की गई।
भारत का पक्ष :
- जलवायु वित्त में कमी पर चिंता: भारत की ओर से दूतावास के द्वितीय सचिव हरकीरत सिंह रंधावा ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर क्लाइमेट फाइनेंस के घटते स्तर और अनुकूलन वित्तपोषण में बढ़ते अंतर को लेकर गहरी चिंता जताई।
- इक्विटी (समानता) का सिद्धांत: भारत ने जोर दिया कि विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी समझते हुए उत्सर्जन में तेजी से कटौती करनी चाहिए ताकि विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन और सतत विकास के लिए आवश्यक 'कार्बन स्पेस' मिल सके।
- व्यापार बाधाओं का विरोध: भारत ने यूरोपीय संघ के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) जैसी एकतरफा व्यापारिक पाबंदियों का पुरजोर विरोध किया
वैश्विक हरित लक्ष्यों के पूरा न होने का संकट :
- सम्मेलन के दौरान वैश्विक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा कीमतों में वृद्धि तथा जलवायु वित्त की भारी कमी के चलते वैश्विक हरित लक्ष्यों के पूरा न होने का संकट बढ़ गया है।
- वित्तपोषण की माँग : स्वास्थ्य संगठनों ने समृद्ध देशों से वर्ष 2035 तक सार्वजनिक अनुकूलन वित्त को तीन गुना बढ़ाकर $120 अरब प्रति वर्ष करने की मांग की है। यह फंड मुख्य रूप से जल-संकट और स्वास्थ्य आपदाओं से जूझ रहे विकासशील देशों की सुरक्षा के लिए मांगा जा रहा है।
- जीवाश्म ईंधनों से दूरी : वार्ताकार विकसित देशों से कोयला, तेल और गैस को छोड़ने के लिए एक स्पष्ट, चरणबद्ध और आंतरिक रोडमैप की मांग कर रहे हैं। पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C की सीमा के भीतर रखना अनिवार्य है।
- विश्वास का संकट और COP31 की मेजबानी : इस वर्ष (2026) के अंत में होने वाले COP31 की संयुक्त मेजबानी ऑस्ट्रेलिया और तुर्किए द्वारा की जा रही है। वर्तमान बॉन वार्ताएं मुख्य रूप से प्रशांत द्वीपीय देशों के विश्वास को जीतने पर केंद्रित हैं, क्योंकि ये देश समुद्र का स्तर बढ़ने के कारण सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
- वैश्विक प्रगति सूचक : सम्मेलन में टीमें 59 बेलेम अनुकूलन संकेतकों और जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म को लागू करने पर काम कर रही हैं। जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म यह सुनिश्चित करता है कि जब हरित ऊर्जा को अपनाया जाए, तो पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्रों (जैसे कोयला खदानों) में काम करने वाले स्थानीय समुदायों को निष्पक्ष रोजगार और पुनर्प्रशिक्षण मिले।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) :
- वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए एक सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय संधि है
- उत्पत्ति: इसकी रूपरेखा 1992 के 'रियो पृथ्वी सम्मेलन' में तैयार की गई थी
- लागू: यह संधि 21 मार्च 1994 को लागू हुई
- सचिवालय : इसका मुख्यालय बॉन, जर्मनी में स्थित है
- सदस्यता: वर्तमान में इसमें 198 पक्ष शामिल हैं (लगभग सभी देश)। इसे 'यूनिवर्सल मेंबरशिप' वाली संधि माना जाता है।
Conference of the Parties (COP) :
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है
- अर्थ: 'पार्टीज़' का तात्पर्य उन देशों से है जिन्होंने 1992 की UNFCCC संधि पर हस्ताक्षर किए हैं और उसे अनुमोदित किया है
- बैठक: इसकी बैठक प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है (जब तक कि पक्ष अन्यथा निर्णय न लें).
- अध्यक्षता: COP की अध्यक्षता आमतौर पर पांच संयुक्त राष्ट्र क्षेत्रीय समूहों (अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन, तथा पश्चिमी यूरोप और अन्य) के बीच बारी-बारी से बदलती है. मेजबान देश का पर्यावरण मंत्री आमतौर पर COP का अध्यक्ष बनता है
प्रमुख COP बैठकें :
- COP 1 (1995 - बर्लिन, जर्मनी): UNFCCC की पहली आधिकारिक बैठक, जहां भविष्य के बाध्यकारी लक्ष्यों की रूपरेखा तय हुई
- COP 3 (1997 - क्योटो, जापान): ऐतिहासिक क्योटो प्रोटोकॉल अपनाया गया, जिसने विकसित देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य लागू किए.
- COP 15 (2009 - कोपेनहेगन, डेनमार्क): यह बैठक किसी बाध्यकारी समझौते तक पहुंचने में विफल रही, लेकिन विकसित देशों द्वारा 2020 तक सालाना $100 बिलियन जुटाने का राजनीतिक संकल्प लिया गया.
- COP 21 (2015 - पेरिस, फ्रांस): ऐतिहासिक पेरिस समझौता अपनाया गया. तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने और 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDCs) की व्यवस्था लागू हुई.
- COP 26 (2021 - ग्लासगो, यूके): कोयले के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने (Phase-down) और भारत द्वारा 'पंचामृत' लक्ष्यों व 'LiFE' आंदोलन की घोषणा की गई.
- COP 28 (2023 - दुबई, यूएई): पहली बार वैश्विक स्टॉकटेक पूरा हुआ और जीवाश्म ईंधन से दूर जाने पर ऐतिहासिक सहमति बनी.
- COP 29 (2024 - बाकू, अज़रबैजान): वर्ष 2035 तक विकासशील देशों के लिए सालाना $300 बिलियन का नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य (NCQG) वित्तीय सहायता के रूप में तय किया गया.
- COP 30 (2025 - बेलेम, ब्राजील): अमेज़न के मुहाने पर आयोजित इस बैठक में देशों ने अपने नए, अधिक कड़े NDCs (2035 के लक्ष्यों के साथ) प्रस्तुत किए और 59 अनुकूलन संकेतकों को मंजूरी दी.
- COP 31 (नवंबर 2026 - ऑस्ट्रेलिया, तुर्किये): आगामी बैठक जहां बॉन जलवायु वार्ता (SB64) में तैयार किए गए तकनीकी रोडमैप और वित्तीय वितरण ढांचे को अंतिम रूप दिया जाएगा
UNFCCC के दो सहायक निकाय:
- SBSTA: वैज्ञानिक एवं तकनीकी परामर्श के लिए सहायक निकाय
- SBI: कार्यान्वयन हेतु सहायक निकाय









