26 May, 2026
'भूल जाने का अधिकार' : अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार
Wed 03 Jun, 2026
संदर्भ :
- दिल्ली हाईकोर्ट ने जून 2026 में एक ऐतिहासिक फैसले के तहत 'भूल जाने के अधिकार' (Right to be Forgotten - RTBF) को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता के अधिकार (Right to Privacy) का एक अभिन्न हिस्सा माना।
मुख्य बिन्दु :
- न्यायाधीश: यह फैसला जस्टिस सचिन दत्ता की एकल पीठ द्वारा सुनाया गया
मामले की पृष्ठभूमि:
- कोर्ट ने लगभग 30 से अधिक याचिकाओं (प्रमुख मामला: लक्ष्य वीर सिंह यादव बनाम भारत संघ) पर एक साथ सुनवाई की।
- याचिकाकर्ताओं में वे लोग शामिल थे जो आपराधिक मामलों में बरी हो चुके थे, जिनका पारिवारिक विवाद सुलझ चुका था, या जिनके मामले रद्द हो चुके थे, लेकिन इंटरनेट पर उनका नाम खोजते ही पुराने मुकदमों की जानकारी सामने आ जाती थी।
अदालत का निर्णय:
- कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर किसी व्यक्ति के अतीत की नकारात्मक कानूनी उलझनों का लगातार दिखाई देना उसके सम्मान और आजीविका के अवसरों को प्रभावित करता है।
- यदि कोई मामला खत्म हो चुका है, तो व्यक्ति को डिजिटल दुनिया में 'भूल जाने का अधिकार' मिलना चाहिए।
- नाम-आधारित खोज पर रोक: अदालत ने गूगल जैसे सर्च इंजन और 'इंडियन कानून' जैसे डिजिटल कानूनी डेटाबेस को निर्देश दिया कि वे बरी हो चुके व्यक्तियों के न्यायिक रिकॉर्ड को डी-इंडेक्स करें
संवैधानिक एवं कानूनी ढांचा :
| क्षेत्र | संवैधानिक प्रावधान / केस लॉ | विवरण |
| मूल अधिकार | अनुच्छेद 21 (Article 21) | प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार। इसके तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार में 'निजता का अधिकार' और 'भूल जाने का अधिकार' शामिल हैं। |
| ऐतिहासिक निर्णय | के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) | सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने निजता के अधिकार (Right to Privacy) को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था। इसी मामले में पहली बार RTBF (सूचनात्मक निजता) का उल्लेख किया गया था। |
| मौजूदा कानून | डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act), 2023 | इस कानून की धारा 12 (Section 12) के तहत नागरिकों को अपने व्यक्तिगत डेटा को सही करने, पूरा करने और मिटाने (Erasure) का अधिकार दिया गया है। |
निजता का अधिकार :
- भारतीय संविधान के तहत निजता का अधिकार (Right to Privacy) अनुच्छेद 21 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है, जिसे जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का आंतरिक भाग माना गया है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2017 के ऐतिहासिक न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारतीय संघ मामले में सर्वसम्मति से निर्णय देते हुए निजता को संविधान के भाग-III के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रताओं का हिस्सा घोषित किया था
न्यायिक विकास :
- एम. पी. शर्मा मामला (1954) और खड़क सिंह मामला (1962): इन शुरुआती मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि भारतीय संविधान द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित नहीं किया गया है।
- गोविंद बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1975): अदालत ने सीमित रूप से निजता को मौलिक अधिकारों के दायरे में स्वीकार करना शुरू किया।
- के.एस. पुट्टास्वामी निर्णय (2017): 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने पुराने फैसलों (शर्मा और खड़क सिंह) को पलटते हुए निजता को एक अविच्छेद्य प्राकृतिक अधिकार और मानवीय गरिमा का मूल तत्व माना।
मौलिक अधिकार :
- भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12 से 35) में मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का उल्लेख किया गया है, जिसे 'भारत का मैग्नाकार्टा' भी कहा जाता है।
- मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा 'संपत्ति के अधिकार' (अनुच्छेद 31) को हटाकर उसे अनुच्छेद 300A के तहत एक कानूनी अधिकार बना दिया गया।
- वर्तमान में भारतीय नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।
6 मुख्य मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण :
- समता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18): कानून के समक्ष समानता और अवसरों की समानता सुनिश्चित करता है।
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22): भाषण, अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और जीवन की सुरक्षा की गारंटी देता है।
- शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24): मानव तस्करी, जबरन श्रम (बेगार) और बाल श्रम पर रोक लगाता है।
- धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28): किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की आजादी देता है।
- संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30): अल्पसंख्यकों के हितों और उनकी भाषा-लिपि के संरक्षण का अधिकार देता है।
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32): अधिकारों के हनन होने पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसे 'संविधान की आत्मा' कहा था
- न्यायसंगत: मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय जा सकते हैं, जो अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत रिट (जैसे- बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश) जारी करते हैं।
- असीमित नहीं : ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं। राज्य इन पर 'उचित प्रतिबंध' लगा सकता है।
- संशोधन योग्य : संसद इनमें संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान के 'मूल ढांचे' को नहीं बदल सकती (केशवानंद भारती केस, 1973)
- आपातकाल में निलंबन: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर सभी मौलिक अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं।
नागरिकों और विदेशियों के बीच अंतर :
| केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त अधिकार | नागरिकों और विदेशियों (शत्रु देश के नागरिकों को छोड़कर) दोनों को प्राप्त अधिकार |
| अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध। | अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण। |
| अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के मामलों में अवसर की समता। | अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण। |
| अनुच्छेद 19: वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति, सभा, संघ, संचरण, निवास और व्यवसाय की स्वतंत्रता। | अनुच्छेद 21 और 21A: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण तथा शिक्षा का अधिकार। |
| अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण। | अनुच्छेद 22: कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण। |
| अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार। | अनुच्छेद 23-24: शोषण के विरुद्ध अधिकार।
अनुच्छेद 25-28: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार। |









