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असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026

Fri 29 May, 2026

संदर्भ :

  • असम विधानसभा द्वारा असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026 को पारित किया गया।

मुख्‍य बिन्‍दु :

  • यह विधेयक विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के लिए धर्म की परवाह किए बिना एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करेगा
  • उत्तराखंड (लागू करने वाला पहला राज्य) और गुजरात के बाद असम देश का तीसरा राज्य (तथा उत्तर-पूर्व का पहला राज्य) बन गया है जिसने इस तरह का नागरिक कानून पास किया है
  • गोवा में भी एक समान नागरिक कानून लागू है, जो पूर्ववर्ती पुर्तगाली औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान :

क्षेत्र प्रावधान का विवरण
विवाह की आयु पुरुषों के लिए न्यूनतम 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष अनिवार्य की गई है।
बहुविवाह पर प्रतिबंध बहुविवाह (Polygamy) और द्विविवाह को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। उल्लंघन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत 7 साल तक की जेल का प्रावधान है। पुराने विवाह सुरक्षित रहेंगे।
अनिवार्य पंजीकरण सभी विवाहों और तलाक का 60 दिनों के भीतर उप-पंजीयक के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
तलाक के समान नियम तलाक के लिए सभी धर्मों के लिए समान आधार तय किए गए हैं। कोई भी विवाह अदालत के आदेश के बिना भंग नहीं हो सकता। तीन तलाक, निकाह हलाला और इद्दत जैसी प्रथाओं पर प्रतिबंध है।
लिव-इन रिलेशनशिप लिव-इन जोड़ों के लिए 30 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य है। अनुपालन न करने पर 3 महीने तक की जेल या ₹10,000 जुर्माना हो सकता है। इस संबंध से पैदा हुए बच्चे पूरी तरह वैध माने जाएंगे।
उत्तराधिकार अधिकार संपत्ति के उत्तराधिकार में बेटियों, पत्नियों और माता-पिता को समान अधिकार दिए गए हैं, जिससे लैंगिक असमानता समाप्त होगी।
  • अनुसूचित जनजातियों (ST) को छूट: असम की विशिष्ट जनसांख्यिकी को देखते हुए, राज्य की अनुसूचित जनजातियों (पहाड़ी और मैदानी दोनों) को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है। उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रथाओं को इसके तहत सुरक्षा प्रदान की गई है।

संवैधानिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :

  • अनुच्छेद 44 (Article 44): यह भारतीय संविधान के भाग 4 में राज्य की नीति के निदेशक तत्व (DPSP) के अंतर्गत आता है, जो राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है।
  • समवर्ती सूची (Concurrent List): विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत कानून संविधान की 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची (प्रविष्टि 5) के अंतर्गत आते हैं। इसी कारण राज्यों को भी इस पर कानून बनाने का अधिकार है।
  • पूर्ववर्ती कानून का निरसन: इस विधेयक के जरिए पुराने 'असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम' को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

समान नागरिक संहिता (UCC) :

  • अनुच्छेद 44: भारतीय संविधान के भाग IV (राज्य नीति के निर्देशक तत्व - DPSP) के तहत यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि "राज्य भारत के पूरे भूभाग में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा"
  • सातवीं अनुसूची: व्यक्तिगत कानून संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 के अंतर्गत आते हैं। इसका अर्थ है कि केंद्र और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकते हैं।

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय :

  • शाह बानो मामला (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा और कहा कि देश में UCC लागू होना चाहिए।
  • सरला मुद्गल मामला (1995): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म अपनाना अवैध है, और राष्ट्रीय अखंडता के लिए UCC की आवश्यकता दोहराई।
  • शायरा बानो मामला (2017): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 'तीन तलाक' (तलाक-ए-बिद्दात) की प्रथा को असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया

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