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चार प्रमुख संसदीय समितियों का पुनर्गठन

Sat 02 May, 2026

संदर्भ :

  • लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने वर्ष 2026-27 के लिए चार प्रमुख संसदीय समितियों (तीन वित्तीय और एक स्थायी समिति) का पुनर्गठन किया।

पुनर्गठित प्रमुख समितियां और उनके अध्यक्ष (2026-27):

लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee - PAC):

  • अध्यक्ष: के.सी. वेणुगोपाल (कांग्रेस)
  • संरचना: इसमें कुल 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)
  • मुख्य कार्य: यह समिति भारत सरकार के विनियोग खातों और भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों की जांच करती है

प्राकलन समिति (Estimates Committee):

  • अध्यक्ष: डॉ. संजय जायसवाल (भाजपा)
  • संरचना: यह सबसे बड़ी संसदीय समिति है जिसमें 30 सदस्य होते हैं, जो केवल लोकसभा से चुने जाते हैं
  • मुख्य कार्य: बजट में शामिल अनुमानों की जांच करना और सार्वजनिक व्यय में मितव्ययिता के लिए सुझाव देना

सार्वजनिक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings):

  • अध्यक्ष: बैजयंत पांडा (भाजपा)
  • संरचना: इसमें 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)
  • मुख्य कार्य: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के खातों और रिपोर्टों की जांच करना

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति:

  • अध्यक्ष: फग्गन सिंह कुलस्ते (भाजपा)
  • संरचना: इसमें कुल 30 सदस्य होते हैं (20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से)
  • मुख्य कार्य: एससी और एसटी के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करना
    • कार्यकाल: इन स्थायी समितियों का कार्यकाल सामान्यतः 1 वर्ष का होता है।
    • नियुक्ति: अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।
    • परंपरा: लोक लेखा समिति का अध्यक्ष आमतौर पर विपक्षी दल से होता है।
    • पात्रता: कोई भी मंत्री इन समितियों का सदस्य नहीं बन सकता है।

संवैधानिक आधार :

  • अनुच्छेद 105: यह सांसदों के विशेषाधिकारों और समितियों की शक्तियों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 118: यह संसद को अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन के संचालन के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है। इसी के तहत समितियों का गठन और संचालन नियम बनाए गए हैं।

समितियों की विस्तृत कार्यप्रणाली :

  • ये समितियाँ "लघु संसद" (Mini-Parliament) के रूप में कार्य करती हैं। इनकी कार्यप्रणाली के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:
  • चुनाव और नियुक्ति: सदस्यों का चुनाव अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा किया जाता है, जिससे सभी दलों को उनकी संख्या के आधार पर जगह मिलती है। अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष करते हैं।
  • मंत्रियों का प्रतिबंध: किसी भी मंत्री को इन वित्तीय समितियों का सदस्य नहीं बनाया जा सकता, ताकि कार्यपालिका की निष्पक्ष जांच हो सके।
  • साक्ष्यों की जांच: समितियाँ सरकारी अधिकारियों को बुलाकर उनसे पूछताछ कर सकती हैं और फाइलों या दस्तावेजों की मांग कर सकती हैं।
  • रिपोर्ट तैयार करना: विस्तृत चर्चा और जांच के बाद, समितियाँ अपनी रिपोर्ट सदन (लोकसभा/राज्यसभा) के पटल पर रखती हैं।
  • सलाहकारी प्रकृति: इन समितियों की सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन इन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाता है।

प्रमुख समितियों के विशिष्ट कार्य :

समिति कार्य की प्रकृति
लोक लेखा समिति (PAC) यह 'कैग' (CAG) की रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करती है। यह देखती है कि पैसा उसी मद में खर्च हुआ जिसके लिए स्वीकृत था या नहीं। इसे 'संसद का प्रहरी' कहा जाता है।
प्राकलन समिति यह बजट अनुमानों की जांच करती है। इसका मुख्य उद्देश्य शासन में 'मितव्ययिता' (Economy) लाना है, इसलिए इसे 'सतत प्राकलन समिति' भी कहते हैं।
सार्वजनिक उपक्रम समिति यह जाँचती है कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ (जैसे ONGC, BHEL) व्यावसायिक सिद्धांतों और अच्छे विवेक के साथ चलाई जा रही हैं।

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