20 April, 2026
हरिवंश नारायण सिंह
Fri 17 Apr, 2026
संदर्भ :
- हरिवंश नारायण सिंह लगातार तीसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए।
मुख्य बिन्दु :
- निर्विरोध निर्वाचन: विपक्ष द्वारा कोई उम्मीदवार खड़ा न किए जाने के कारण उन्हें सर्वसम्मति से निर्विरोध चुना गया।
- प्रस्ताव: राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने ध्वनि मत से स्वीकार कर लिया।
- मनोनीत सदस्य के रूप में चयन: उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया था। इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति से रिक्त हुए पद पर सदन के लिए मनोनीत किया था।
- प्रधानमंत्री की बधाई: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि लगातार तीसरी बार चुना जाना सदन के उन पर गहरे विश्वास का प्रतीक है।
- कार्यकाल: राज्यसभा के उपसभापति के रूप में उनका यह तीसरा कार्यकाल 2032 तक रहेगा।
- हरिवंश नारायण सिंह पहली बार 2018 में उपसभापति चुने गए थे और तब से वह इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं।
राज्यसभा के उपसभापति: संवैधानिक स्थिति और कार्य :
- अनुच्छेद 89(1): भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होता है।
- अनुच्छेद 89(2): राज्यसभा अपने सदस्यों में से किसी एक को उपसभापति चुनती है। जब भी उपसभापति का पद रिक्त होता है, सदन किसी अन्य सदस्य को इस पद के लिए चुनता है।
अनुच्छेद 90:
- पद की रिक्ति: यदि उपसभापति राज्यसभा का सदस्य नहीं रहता, तो उसका पद स्वतः रिक्त हो जाता है।
- त्यागपत्र: वह सभापति को संबोधित करके लिखित रूप में अपना त्यागपत्र दे सकता है
- हटाया जाना: उसे राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (Majority) से पारित संकल्प द्वारा पद से हटाया जा सकता है। इसके लिए 14 दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है
अनुच्छेद 91:
- पद रिक्त होने पर: यदि सभापति का पद रिक्त है या उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा है, तो उपसभापति सभापति के कर्तव्यों का पालन करेगा।
- दोनों अनुपस्थित होने पर: यदि उपसभापति का पद भी रिक्त है, तो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यसभा का कोई सदस्य उस पद के कर्तव्यों का निर्वहन करेगा
अनुच्छेद 92:
- अध्यक्षता पर रोक: यदि सभापति (उपराष्ट्रपति) या उपसभापति को पद से हटाने का कोई प्रस्ताव सदन में विचाराधीन है, तो वे उस समय पीठासीन (Preside) नहीं करेंगे, भले ही वे सदन में उपस्थित हों।
- बोलने का अधिकार: सभापति को ऐसी कार्यवाही के दौरान सदन में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है, लेकिन वह निर्णायक मत (Casting Vote) नहीं दे सकते।
- भूमिका और कार्य: जब सभापति (उपराष्ट्रपति) का पद रिक्त हो या वे सदन में अनुपस्थित हों, तब उपसभापति सदन की अध्यक्षता करते हैं। उस अवधि के दौरान उन्हें सभापति की सभी शक्तियाँ और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
- मतदान की शक्ति (Casting Vote): अध्यक्षता करते समय उपसभापति 'प्रथमदृष्टया' (पहली बार में) मतदान नहीं करते। वे केवल तभी मतदान करते हैं जब किसी विषय पर पक्ष और विपक्ष के मत बराबर (Tie) हो जाएँ। इसे निर्णायक मत कहा जाता है।
- पद की स्वतंत्रता: उपसभापति, सभापति के अधीनस्थ (Subordinate) नहीं होते। वे सीधे राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं और उनका पद एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है।
- सामान्य सदस्य के रूप में स्थिति: जब सभापति सदन की अध्यक्षता कर रहे होते हैं, तब उपसभापति एक सामान्य सदस्य की तरह सदन की कार्यवाही में भाग लेते हैं, चर्चा करते हैं और किसी भी प्रस्ताव पर सामान्य सदस्य की तरह मतदान कर सकते हैं।
पद की रिक्ति और त्यागपत्र:
उनका पद तीन स्थितियों में रिक्त हो सकता है:
- यदि उनकी राज्यसभा की सदस्यता समाप्त हो जाए।
- यदि वे सभापति को संबोधित करते हुए अपना लिखित त्यागपत्र दे दें।
- यदि उन्हें सदन द्वारा संकल्प पारित करके हटा दिया जाए।
- हटाने की प्रक्रिया: उन्हें राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के प्रभावी बहुमत (Effective Majority) से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है। इसके लिए 14 दिन की पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।
- पीठासीन होने पर रोक: जब उपसभापति को उनके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। हालांकि, वे सदन में उपस्थित रह सकते हैं और कार्यवाही में भाग ले सकते हैं।
- वेतन एवं भत्ते: उपसभापति के वेतन और भत्ते संसद द्वारा कानून बनाकर निर्धारित किए जाते हैं। ये भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित होते हैं, जिसका अर्थ है कि इन पर संसद में मतदान नहीं होता।
- उपसभापतियों का पैनल (Panel of Vice-Chairpersons): राज्यसभा के नियमों के तहत, सभापति सदन के सदस्यों में से कुछ सदस्यों को 'उपसभापतियों के पैनल' में नामित करते हैं।
- सभापति और उपसभापति की अनुपस्थिति में इस पैनल का कोई भी सदस्य सदन की अध्यक्षता कर सकता है।
- महत्वपूर्ण: यदि सभापति और उपसभापति के पद रिक्त (Vacant) हों (यानी पद पर कोई नियुक्त ही न हो), तो पैनल का सदस्य अध्यक्षता नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यसभा का कोई सदस्य सभापति के कर्तव्यों का पालन करता है।
महत्वपूर्ण प्रथम (Firsts):
- प्रथम उपसभापति: एस. वी. कृष्णमूर्ति राव (S. V. Krishnamoorthy Rao) राजसभा के पहले उपसभापति थे। इनका कार्यकाल 1952 से 1962 तक रहा।
- प्रथम महिला उपसभापति: वायलेट अल्वा (Violet Alva) राजसभा की पहली महिला उपसभापति थीं। वे 1962 से 1969 तक इस पद पर रहीं।
- प्रथम गैर-सत्तारूढ़ दल के उपसभापति: डॉ. बी. डी. खोबरागड़े (B. D. Khobragade) पहले ऐसे उपसभापति थे जो सत्ताधारी दल से नहीं थे (वे रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया से थे)।
- विपक्ष के साथ मुकाबला: आमतौर पर यह पद निर्विरोध चुना जाता है, लेकिन 1969 में पहली बार इस पद के लिए चुनाव (Contest) हुआ था।









