01 April, 2026
वन्यजीवों की प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय का 15वां सम्मेलन
Fri 03 Apr, 2026
संदर्भ :
- प्रवासी वन्यजीवों की प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS COP15) का 15वें सम्मेलन का आयोजन ब्राजील के कैम्पो ग्रांडे में किया गया।
मुख्य बिन्दु :
- आयोजन स्थान : ब्राजील, कैम्पो ग्रांडे , माटो ग्रोसो डो सुल (यह शहर विश्व के सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय आर्द्रभूमि, पंतनल का प्रवेश द्वार माना जाता है)
- ब्राजील ने पहली बार इस वैश्विक सम्मेलन की मेजबानी की
- सम्मेन का विषय : "जीवन को बनाए रखने के लिए प्रकृति से जुड़ना"("Connecting Nature to Sustain Life")
- भागीदारी : 130 से अधिक सदस्य देशों द्वारा
- CMS COP 14 का आयोजन उज्बेकिस्तान के समरकंद में किया गया था, जिसमें CMS परिशिष्टों में यूरेशियन लिंक्स, पलास कैट और सैंड टाइगर शार्क आदि सहित 14 प्रजातियों को जोड़ा गया था।
प्रमुख परिणाम :
- महत्वपूर्ण परिणाम: सम्मेलन के दौरान लगभग 40 नई प्रवासी प्रजातियों को संरक्षण सूची में शामिल करने का निर्णय लिया गया, जिनमें चीता, धारीदार लकड़बग्घा और बर्फीले उल्लू जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
- रणनीतिक योजना: इस बैठक में समरकंद रणनीतिक योजना 2024–2032 के कार्यान्वयन और इसे 'कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे' के साथ जोड़ने पर जोर दिया गया।
प्रजातियों का वर्गीकरण तंत्र (सरल रूप में पुनर्लेखन):
- परिशिष्ट I (उच्च जोखिम वाली प्रजातियाँ): इस श्रेणी में वे प्रवासी प्रजातियाँ आती हैं जो जंगली अवस्था में विलुप्त होने के कगार पर हैं या IUCN के अनुसार अत्यंत संकटग्रस्त से लेकर संकटग्रस्त तक मानी जाती हैं। इनके लिए सख्त संरक्षण उपाय अपनाना और देशों के बीच समन्वित प्रयास करना आवश्यक होता है।
- परिशिष्ट II (संरक्षण हेतु सहयोग आवश्यक): इसमें वे प्रजातियाँ शामिल होती हैं जो निकट संकटग्रस्त से लेकर अत्यंत संकटग्रस्त स्थिति तक पहुँच सकती हैं। इनके संरक्षण और प्रबंधन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग, समझौते और योजनाओं को बढ़ावा दिया जाता है।
- समझौते और MoUs: CMS प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिए बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौतों के साथ-साथ गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापनों (MoUs) को बढ़ावा देता है, ताकि विभिन्न देश मिलकर संरक्षण प्रयास कर सकें।
- वैज्ञानिक मूल्यांकन:यह ‘स्टेट ऑफ माइग्रेटरी स्पीशीज रिपोर्ट (2026)’ जैसे वैश्विक आकलन जारी करता है, जो तथ्यों और शोध पर आधारित नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स माइग्रेटरी स्पीशीज़: अंतरिम रिपोर्ट 2026’ :
- सम्मेलन के दौरना ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स माइग्रेटरी स्पीशीज़: अंतरिम रिपोर्ट 2026’ जारी की गई, जिसके अनुसार CMS के तहत संरक्षित लगभग 49% प्रवासी प्रजातियों की आबादी घट रही है।
- अन्य 24% विलुप्त होने के कगार पर हैं
- इस गिरावट का कारण मछली पकड़ने और शिकार जैसे अत्यधिक दोहन, आवास का नुकसान और प्रभावित प्रजातियों के प्रवासी गलियारों का विखंडन हो सकता है
- "कुछ प्रजातियां समन्वित संरक्षण उपायों पर प्रतिक्रिया दे रही हैं, लेकिन बहुत सी प्रजातियां अपने प्रवासी मार्गों पर बढ़ते दबाव का सामना करना जारी रखे हुए हैं।"
- कुल 188 प्रवासी प्रजातियां वर्तमान में विलुप्त होने की संभावना का सामना कर रही हैं, जिनमें 28 स्थलीय स्तनधारी, 23 जलीय स्तनधारी, 103 प्रजातियों के पक्षी, 8 सरीसृप प्रजातियां और 26 प्रकार की मछलियां शामिल हैं
- CMS में सूचीबद्ध 26 प्रजातियां, जिनमें 18 प्रवासी तटीय पक्षी शामिल हैं, विलुप्त होने के उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आ गई हैं।
- प्रवासी प्रजाति चैंपियन पुरस्कार: दीर्घकालिक संरक्षण पहलों में उनके योगदान के लिए 9 नए चैंपियनों को मान्यता दी गई:
- उज़्बेकिस्तान सरकार: मध्य एशियाई फ्लाईवे (Central Asian Flyway) और प्रवासी स्तनधारियों के संरक्षण हेतु।
- ऑस्ट्रेलिया सरकार: प्रवासी तटीय पक्षियों (Migratory Shorebirds) और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए।
- मोनाको रियासत की सरकार: समुद्री कछुओं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु।
- फ़्लैंडर्स सरकार (बेल्जियम): जलीय पारिस्थितिकी और जलीय प्रवासी प्रजातियों के लिए।
- फ्रांसीसी जैव विविधता एजेंसी (AFB): अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रजातियों के वैज्ञानिक मानचित्रण हेतु।
- सऊदी अरब (राष्ट्रीय वन्यजीव केंद्र): लुप्तप्राय प्रजातियों के पुनरुद्धार (जैसे कि ओरिक्स और अन्य मरुस्थलीय प्रवासी जीव) हेतु।
- यूरोपीय आयोग (European Commission): वैश्विक जैव विविधता नीतियों और वित्तीय सहायता के लिए।
- जर्मन संघीय प्रकृति संरक्षण एजेंसी (BfN): मध्य एशियाई और अफ्रीकी प्रवासी पक्षियों के संरक्षण हेतु।
- समुद्री पर्यावरण संरक्षण हेतु क्षेत्रीय संगठन (ROPME): समुद्री जीवन और समुद्री प्रदूषण नियंत्रण के माध्यम से प्रजातियों की सुरक्षा के लिए।
प्रवासी प्रजातियाँ :
- वे जंगली जीव हैं (जलीय, पक्षी, स्थलीय) जो भोजन, प्रजनन या अनुकूल जलवायु के लिए चक्रीय और अनुमानित रूप से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास करते हैं।
- ये प्रजातियाँ अक्सर अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ पार करती हैं और जीवन चक्र के विभिन्न चरणों के लिए अलग-अलग आवासों पर निर्भर करती हैं।
प्रवासी प्रजातियों के प्रमुख पहलू:
- प्रकृति: यह प्रवास (Migration) भोजन प्राप्त करने (Feeding), प्रजनन (Breeding) या आराम (Stopover) करने के लिए होता है।
- प्रकार: इसमें साइबेरियन क्रेन जैसे पक्षी, ह्वेल जैसी जलीय जीव, और हाथी या बारहसिंगा जैसे स्थलीय जानवर शामिल हैं।
- महत्व: पारिस्थितिक संतुलन के लिए इनका संरक्षण महत्वपूर्ण है, जिसके लिए बोन कन्वेंशन (CMS) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ काम करती हैं।
- खतरे: जलवायु परिवर्तन और आवासों के नष्ट होने से इनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
प्रवासी प्रजातियों में शामिल :
- पक्षी: बार-टेल्ड गॉडविट, आर्कटिक टर्न
- स्तनधारी: स्थलीय स्तनधारियों में वाइल्डबीस्ट , साइगा मृग आदि शामिल हैं, जबकि समुद्री स्तनधारियों में हंपबैक व्हेल , ग्रे व्हेल आदि शामिल हैं
- मछली: सैल्मन, यूरोपीय ईल, आदि
- सरीसृप: लेदरबैक कछुआ, ऑलिव रिडले कछुआ , आदि
- कीट-पतंगे: मोनार्क तितली , ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई
भारत में प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण हेतु पहल :
| पहल / योजना | अवधि | संस्था / जिम्मेदारी | उद्देश्य |
| मध्य एशियाई फ्लाईवे के साथ प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना | 2018–2023 | भारत सरकार | प्रवासी पक्षी प्रजातियों की जनसंख्या में गिरावट को रोकना और उनके आवासों को सुरक्षित करना |
| महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (Important Bird Areas - IBA) पहचान कार्यक्रम | सतत | बर्डलाइफ इंटरनेशनल | विश्व के पक्षियों और उनसे जुड़ी जैव विविधता के संरक्षण हेतु संरक्षित क्षेत्रों का वैश्विक नेटवर्क स्थापित और संरक्षित करना |
| राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्य योजना | 2021–2026 | भारत सरकार | स्वस्थ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए समुद्री कछुओं और उनके आवासों का संरक्षण करना |
प्रवासी वन्य जीवों के संरक्षण पर सम्मेलन (CMS / Bonn Convention) :
| पहल / विषय | विवरण |
| संस्था | संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अंतर्गत अंतरसरकारी संधि |
| उद्देश्य | प्रवासी जानवरों और उनके आवासों के संरक्षण तथा सतत उपयोग के लिए वैश्विक मंच |
| प्रस्तुति वर्ष | 1979 |
| प्रवर्तन वर्ष | 1983 |
| सदस्यता | अफ्रीका, मध्य और दक्षिण अमेरिका, एशिया, यूरोप और ओशिनिया के 133 पक्षकार |
| भारत की स्थिति | भारत 1983 से सदस्य है |
CMS परिशिष्ट :
| परिशिष्ट | विवरण |
| परिशिष्ट I | लुप्तप्राय प्रवासी प्रजातियों की सूची (निकट भविष्य में विलुप्त होने का खतरा) |
| परिशिष्ट II | संरक्षण स्थिति अनुकूल नहीं, अंतरराष्ट्रीय समझौतों की आवश्यकता वाली प्रजातियाँ |
भारत और CMS :
| पहल / गतिविधि | विवरण |
| MoU हस्ताक्षर | साइबेरियन क्रेन (1998), समुद्री कछुए (2007), डुगोंग (2008), रैप्टर्स (2016) |
| COP-13 | भारत ने 2020 में गांधीनगर (गुजरात) में मेजबानी की |
| विशेष पहल | मध्य एशियाई फ्लाईवे और मध्य एशियाई स्तनधारी पहल |
| ZSI की भूमिका | COP-13 से पहले पहली बार भारत की प्रवासी प्रजातियों की सूची संकलित की |









