07 March, 2026
इच्छामृत्यु के मौलिक अधिकार को मान्यता
Thu 12 Mar, 2026
संदर्भ :
- सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देते हुए गरिमापूर्ण मृत्यु के मौलिक अधिकार को मान्यता दी।
पृष्ठभूमि :
- हरीश राणा (गाजियाबाद निवासी) ने अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में एक पेइंग गेस्ट हॉस्टल से चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर सिर की चोटें लगी थीं।
- हादसा: 2013 (रक्षाबंधन के दिन) को चंडीगढ़ में 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र हरीश राणा अपने पीजी (PG) की चौथी मंजिल से गिर गए थे।
- चोट: सिर में गंभीर चोट लगने और कोमा में जाने के कारण वे क्वाड्रिप्लेजिया (शरीर के चारों अंगों का लकवा) के शिकार हो गए।
- जीवन स्थिति: वह पिछले 13 वर्षों से वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे, बिना किसी रिकवरी की संभावना के।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला :
- न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने फैसला दिया
- इच्छा मृत्यु को मंजूरी: जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने मेडिकल रिपोर्टों की समीक्षा के बाद, 'राइट टू डाई विथ डिग्निटी' (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) के तहत पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी।
- आधार: कोर्ट ने माना कि उनके शरीर में कोई सुधार नहीं है और उन्हें इस दर्दनाक स्थिति में रखना उचित नहीं है।
- विशेष निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS को हरीश राणा को पैलिएटिव केयर (दर्द प्रबंधन) में रखने के बाद जीवन रक्षक उपचार हटाने का निर्देश दिया।
संवैधानिक आधार:
- अनुच्छेद 21: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त 'जीवन के अधिकार' में 'गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार' (Right to Die with Dignity) भी शामिल है।
- अविभाज्य अधिकार: कोर्ट के अनुसार, गरिमा के साथ मरने का अधिकार गुणवत्तापूर्ण उपशामक देखभाल (Palliative Care) प्राप्त करने के अधिकार से अविभाज्य है।
इच्छामृत्यु :
- किसी असहनीय और लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए जानबूझकर जीवन समाप्त करना।
इच्छामृत्यु के प्रकार:
- सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): जानबूझकर इंजेक्शन या दवा देकर मृत्यु लाना, जो भारत में अवैध है
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): जीवन रक्षक प्रणाली (Ventilator/Medicine) को हटाना ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके
- स्वैच्छिक (Voluntary): मरीज की इच्छा पर
- अनैच्छिक (Non-voluntary): जब मरीज बेहोश हो और फैसला न ले सके (जैसे कोमा)
भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) की विधिक एवं संवैधानिक स्थिति :
भारत में जीवन के अधिकार और मृत्यु के अधिकार के बीच का कानूनी संतुलन काफी सूक्ष्म है। वर्तमान स्थिति को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
सक्रिय बनाम निष्क्रिय इच्छामृत्यु: कानूनी अंतर :
- सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): भारत में यह पूरी तरह अवैध और दंडनीय है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने वाला जानबूझकर किया गया कृत्य अपराध है। इसे मामले की गंभीरता के आधार पर धारा 101 (हत्या) या धारा 100 (गैर इरादतन हत्या) के तहत श्रेणीबद्ध किया जा सकता है।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): सर्वोच्च न्यायालय ने इसे कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में वैध माना है। इसमें लाइलाज बीमारी की स्थिति में मरीज को कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों (जैसे वेंटिलेटर) से हटा लिया जाता है, बशर्ते यह मरीज के सर्वोत्तम हित में हो और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करता हो।
अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण मृत्यु का सिद्धांत :
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन की रक्षा नहीं करता, बल्कि 'मानवीय गरिमा' के साथ जीने के अधिकार की गारंटी देता है। न्यायपालिका ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है:
- सामान्यतः इसमें 'मरने का अधिकार' शामिल नहीं है।
- किंतु, यदि कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में है जहाँ जीवन केवल पीड़ा बनकर रह गया है, तो 'गरिमापूर्ण मृत्यु' (Death with Dignity) को उसके मौलिक अधिकार के विस्तार के रूप में मान्यता दी जाती है।
विधि आयोग (Law Commission) का दृष्टिकोण
विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट (2012) ने इस विधिक विमर्श को एक नई दिशा दी थी:
- मरीज की स्वायत्तता: यदि कोई मानसिक रूप से सक्षम मरीज जीवन रक्षक उपचार लेने से इनकार करता है, तो उसे कानूनी रूप से सही माना जाना चाहिए।
- चिकित्सकों को संरक्षण: यदि कोई डॉक्टर मरीज की स्पष्ट और सूचित इच्छा (Informed Consent) के अनुसार उपचार रोकता है, तो उसे 'आत्महत्या के लिए उकसाने' या 'हत्या' का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इच्छामृत्यु पर ऐतिहासिक न्यायिक घोषणाएं :
- मारुति श्रीपति दुबल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1987): इस मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले 'जीवन के अधिकार' में 'मरने का अधिकार' भी अंतर्निहित है। अदालत का तर्क था कि जो व्यक्ति लाइलाज बीमारी या असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं, उन्हें अपना जीवन समाप्त करने का विकल्प मिलना चाहिए।
- ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के पिछले फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार एक प्राकृतिक अधिकार है, जिसमें खुद को खत्म करने का अधिकार शामिल नहीं है। कोर्ट ने माना कि जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है और इसे समाप्त करना असंवैधानिक है।
- अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011): यह मामला भारतीय कानूनी इतिहास में एक मोड़ साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मान्यता दी। अदालत ने कहा कि जो मरीज कोमा (Vegetative State) में हैं, उनके लिए सख्त चिकित्सा दिशानिर्देशों के तहत जीवन रक्षक प्रणाली को हटाया जा सकता है।
- कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018): इस निर्णय में न्यायालय ने सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच स्पष्ट अंतर किया। कोर्ट ने माना कि:
- किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को 'गरिमा के साथ मरने' का मौलिक अधिकार है।
- लिविंग विल (Living Will): व्यक्ति अपने भविष्य के उपचार के संबंध में 'अग्रिम निर्देश' दे सकता है कि यदि वह निर्णय लेने की स्थिति में न रहे, तो उसे कृत्रिम रूप से जीवित न रखा जाए।
सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) वाले देश :
- नीदरलैंड (2002): यह दुनिया का पहला देश था जिसने इसे वैध बनाया। यहाँ 'डूओ-इच्छामृत्यु' (साथी के साथ मृत्यु) की भी अनुमति है।
- बेल्जियम (2002): यहाँ बच्चों (लाइलाज बीमारी की स्थिति में) के लिए भी इसके द्वार खुले हैं।
- कनाडा (2016): यहाँ 'MAID' (Medical Assistance in Dying) कानून के तहत यह सुविधा उपलब्ध है, जो अब गैर-घातक लेकिन गंभीर स्थितियों पर भी लागू होता है।
- अन्य देश: कोलंबिया, लक्ज़मबर्ग, स्पेन (2021), न्यूजीलैंड (2021) और इक्वाडोर (2024)।
- ऑस्ट्रेलिया: इसके सभी छह राज्यों (जैसे विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स) में यह कानूनी है।
सहायता प्राप्त आत्महत्या (Assisted Suicide) वाले देश :
- स्विट्जरलैंड: यहाँ 1940 के दशक से यह वैध है। विशेष बात यह है कि यहाँ विदेशी नागरिकों को भी यह सुविधा मिलती है (Dignitas जैसे संगठनों के माध्यम से)।
- अमेरिका: ओरेगन, वॉशिंगटन, कैलिफोर्निया और वरमोंट सहित लगभग 10-11 राज्यों में यह कानूनी है। डेलावेयर में भी यह कानून 1 जनवरी 2026 से प्रभावी हो गया है।
- अन्य: ऑस्ट्रिया, जर्मनी और इटली ने भी इसे कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अनुमति दी है।









