09 February, 2026
अंतरराष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS) 2026
Mon 16 Feb, 2026
13 फरवरी 2026 से प्रारम्भ हुआ दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय बांध सुरक्षा सम्मेलन (ICDS 2026) सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, इंजीनियरों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों तथा संस्थागत प्रतिनिधियों ने भाग लिया और भारत में बांध सुरक्षा ढाँचे, जलवायु-लचीलापन तथा सतत जलाशय प्रबंधन को सुदृढ़ करने पर विचार किया।
पृष्ठभूमि
- भारत विश्व के उन देशों में है जहाँ बड़े बांधों की संख्या अत्यधिक है (लगभग 5700 से अधिक)। इनमें से अनेक बांध स्वतंत्रता के बाद बने थे और अब उनकी आयु बढ़ने से संरचनात्मक सुरक्षा, जलाशय में गाद भराव तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जोखिम बढ़ गए हैं।
- अत्यधिक वर्षा, बाढ़ तथा मौसमीय अनिश्चितता के कारण बांध सुरक्षा अब केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं बल्कि जल सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, ऊर्जा उत्पादन तथा कृषि सिंचाई से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।
कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा
- सम्मेलन में विशेष रूप से बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 के कार्यान्वयन की समीक्षा की गई, जो भारत का पहला व्यापक राष्ट्रीय कानून है।
इस अधिनियम के अंतर्गत बहुस्तरीय संरचना बनाई गई:
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति (NCDS) – नीति मार्गदर्शन
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) – नियामक निगरानी
- राज्य बांध सुरक्षा संगठन (SDSO) – निरीक्षण एवं क्रियान्वयन
इस प्रणाली का उद्देश्य है:
- नियमित निरीक्षण
- जोखिम मूल्यांकन
- आपातकालीन कार्ययोजना
- जवाबदेही सुनिश्चित करना
डैम रिहैबिलिटेशन एंड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट (DRIP)
सम्मेलन में विश्व बैंक समर्थित DRIP परियोजना की प्रगति पर भी चर्चा हुई।
इस परियोजना के प्रमुख उद्देश्य:
- बांधों की संरचनात्मक मजबूती
- आधुनिक निगरानी उपकरणों की स्थापना
- जोखिम आधारित सुरक्षा मूल्यांकन
- आपदा तैयारी
- संस्थागत क्षमता निर्माण
इस परियोजना के माध्यम से सैकड़ों बांधों का आधुनिकीकरण किया जा चुका है।
सम्मेलन में चर्चा के प्रमुख तकनीकी विषय
1. वृद्ध होते बांध और पुनर्वास
विशेषज्ञों ने बताया कि कई बांध अपनी डिजाइन आयु पार कर चुके हैं। ऐसे में वैज्ञानिक, जोखिम-आधारित पुनर्वास तथा सुदृढ़ गुणवत्ता नियंत्रण अनिवार्य है।
2. जलाशयों में गाद (Sedimentation)
गाद भराव से जल भंडारण क्षमता घटती है तथा सुरक्षा खतरे बढ़ते हैं।
सुझाव दिए गए:
- कैचमेंट क्षेत्र उपचार
- रिमोट सेंसिंग निगरानी
- दीर्घकालिक निवारक गाद प्रबंधन
- टिकाऊ डी-सिल्टिंग मॉडल
3. जोखिम-आधारित निर्णय प्रणाली
सम्मेलन में निम्न उपकरणों की आवश्यकता पर बल दिया गया:
- डैम-ब्रेक विश्लेषण
- जोखिम वर्गीकरण प्रणाली
- आपातकालीन कार्ययोजना (EAP)
- डेटा-आधारित प्राथमिकता निर्धारण
4. जलवैज्ञानिक सुरक्षा एवं बाढ़ प्रबंधन
जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिए गए:
- पूर्वानुमान आधारित जलाशय संचालन
- नदी-घाटी स्तर पर समन्वित प्रबंधन
- रियल-टाइम डेटा साझाकरण
- गतिशील जल प्रबंधन नियम
5. डिजिटल निगरानी एवं नई तकनीक
उद्योग सत्रों में प्रस्तुत तकनीकें:
- रियल-टाइम सेंसर
- उपग्रह निगरानी
- डिजिटल डाटा प्लेटफॉर्म
- निर्णय समर्थन प्रणाली
ये तकनीकें भविष्य में बांध संचालन को अधिक सुरक्षित बनाएंगी।
भारत में विशेष संरचनात्मक चुनौती
- सम्मेलन में बताया गया कि भारत के 85% से अधिक बांध मिट्टी (earthen dams) से बने हैं। अतः अत्यधिक वर्षा के समय ओवरटॉपिंग से विफलता का जोखिम अधिक रहता है। इसलिए नवाचार आधारित सुरक्षा उपायों की आवश्यकता बताई गई।
भारत सरकार की प्रमुख पहलें
- बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021
- राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण
- DRIP परियोजना
- राष्ट्रीय बड़े बांध रजिस्टर
- केंद्रीय जल आयोग की बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
भारत के लिए महत्व
सम्मेलन ने स्पष्ट किया कि आधुनिक बांध सुरक्षा में निम्न तत्व शामिल हैं:
- जलवायु अनुकूलन
- संस्थागत सुधार
- तकनीकी नवाचार
- जोखिम-आधारित नीति
- सामुदायिक जागरूकता
बांधों का महत्व:
- कृषि सिंचाई
- जलविद्युत उत्पादन
- शहरी जल आपूर्ति
- बाढ़ नियंत्रण
किसी बड़े बांध की विफलता से मानवीय, आर्थिक और पर्यावरणीय आपदा हो सकती है।
निष्कर्ष
- ICDS 2026 ने भारत के बांध सुरक्षा ढाँचे को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध किया।
- सम्मेलन से प्राप्त ज्ञान, तकनीकी अनुभव तथा नीति सुझाव भविष्य में सुरक्षित, टिकाऊ और जलवायु-लचीले जल संसाधन प्रबंधन को सुनिश्चित करने में सहायक होंगे।









