09 February, 2026
आईटी नियम संशोधन 2026 के तहत AI-जनित सामग्री की लेबलिंग
Sun 15 Feb, 2026
भारत सरकार ने डिजिटल शासन को मजबूत करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा अधिसूचित यह संशोधन 20 फरवरी 2026 से लागू होगा। इसमें AI-जनित सामग्री को अनिवार्य रूप से लेबल करना तथा अवैध सामग्री हटाने की समय-सीमा को काफी कम करना शामिल है। इसका उद्देश्य डीपफेक, भ्रामक सूचना और सिंथेटिक मीडिया से उत्पन्न जोखिमों को कम करना है।
पृष्ठभूमि और आवश्यकता
- जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से विकास ने ऐसी तस्वीरें, वीडियो और ऑडियो बनाना संभव कर दिया है जो वास्तविक प्रतीत होते हैं।
- इनका दुरुपयोग राजनीतिक प्रचार, वित्तीय धोखाधड़ी, पहचान चोरी और सामाजिक तनाव फैलाने के लिए किया जा सकता है। इसलिए विश्वभर में सरकारें AI पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु नियम बना रही हैं। भारत का यह कदम इसी वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है।
AI-जनित सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग
- संशोधित नियमों के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को “सिंथेटिक रूप से जनित सूचना” (SGI) — जैसे AI-जनित चित्र या वीडियो — को स्पष्ट रूप से लेबल करना होगा। जिन प्लेटफॉर्मों के 50 लाख से अधिक उपयोगकर्ता हैं, उन्हें उपयोगकर्ता से यह घोषणा लेनी होगी कि सामग्री AI-जनित है या नहीं, और प्रकाशन से पहले तकनीकी सत्यापन भी करना होगा।
- सरकार का मानना है कि बिना लेबल वाली सिंथेटिक सामग्री उपयोगकर्ताओं को भ्रमित कर सकती है, निजता का उल्लंघन कर सकती है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।
- हालाँकि, व्यावहारिक कारणों से कुछ छूट दी गई है। उदाहरण के लिए, मोबाइल कैमरे द्वारा स्वतः सुधारी गई तस्वीरें या फिल्मों के विशेष प्रभाव SGI के अंतर्गत नहीं आएंगे। वहीं, कुछ प्रकार की सामग्री पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा — जैसे बाल शोषण सामग्री, नकली दस्तावेज, विस्फोटक बनाने की जानकारी या किसी वास्तविक व्यक्ति की फर्जी डीपफेक।
पहचान और तकनीकी उपाय
- बड़े प्लेटफॉर्मों को अवैध सिंथेटिक सामग्री की पहचान हेतु उचित तकनीकी उपाय अपनाने होंगे और सामग्री के स्रोत (प्रोवेनेंस) को ट्रैक करना होगा।
- इस संदर्भ में C2PA (Coalition for Content Provenance and Authenticity) एक वैश्विक पहल है जो डिजिटल सामग्री में अदृश्य पहचान चिह्न जोड़ने के मानक विकसित करती है। भारत ने किसी विशेष तकनीक को अनिवार्य नहीं किया है, पर ऐसे तंत्रों को प्रोत्साहित किया है।
तुरंत सामग्री हटाने की समय-सीमा
संशोधन में सामग्री हटाने की समय-सीमा भी घटाई गई है:
- सरकारी या न्यायालयीय आदेश पर कार्रवाई: 2–3 घंटे
- संवेदनशील शिकायतों पर प्रतिक्रिया: 36 घंटे
- अन्य शिकायतों पर प्रतिक्रिया: 1 सप्ताह
सरकार के अनुसार, पहले की समय-सीमा में गलत सूचना तेजी से फैल जाती थी, इसलिए त्वरित कार्रवाई आवश्यक है।
उपयोगकर्ता जागरूकता और जवाबदेही
- अब प्लेटफॉर्मों को हर तीन महीने में उपयोगकर्ताओं को नियमों की जानकारी देनी होगी। साथ ही यह चेतावनी भी देनी होगी कि अवैध AI सामग्री पोस्ट करने पर खाता निलंबन, सामग्री हटाना या पहचान कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को देना संभव है।
प्रमुख शब्द (Key Terms)
- AI-जनित सामग्री: कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा बनाई गई डिजिटल मीडिया।
- सिंथेटिक जनित सूचना (SGI): AI द्वारा बनाई या बदली गई दृश्य-श्रव्य सामग्री।
- डीपफेक: AI से तैयार नकली मीडिया जो किसी वास्तविक व्यक्ति जैसा दिखता या बोलता है।
- प्रोवेनेंस ट्रैकिंग: डिजिटल सामग्री की उत्पत्ति और प्रामाणिकता की पहचान करने की तकनीक।
- C2PA: डिजिटल मीडिया की सत्यता प्रमाणित करने के लिए वैश्विक तकनीकी मानक विकसित करने वाला गठबंधन।
- मध्यस्थ (Intermediary): सोशल मीडिया या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जो उपयोगकर्ता सामग्री होस्ट करते हैं।
- टेकडाउन नोटिस: अवैध ऑनलाइन सामग्री हटाने का आधिकारिक आदेश।
निष्कर्ष
- AI-लेबलिंग से जुड़े नए नियम भारत की डिजिटल नीति में महत्वपूर्ण कदम हैं। यह पारदर्शिता, त्वरित कार्रवाई और प्लेटफॉर्म जवाबदेही को बढ़ाते हैं तथा तकनीकी नवाचार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं।









