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शांति अधिनियम और भारत की परमाणु दायित्व व्यवस्था में परिवर्तन

Fri 13 Feb, 2026

  • संसद के शीतकालीन सत्र में पारित शांति अधिनियम (SHANTI Act) भारत की परमाणु ऊर्जा नीति एवं दायित्व ढाँचे में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। यह अधिनियम परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलता है तथा नागरिक परमाणु क्षति दायित्व अधिनियम, 2010 (CLNDA) में निहित दायित्व प्रावधानों में व्यापक संशोधन करता है।
  • सरकार इसे निवेश आकर्षित करने एवं परमाणु क्षमता विस्तार के लिए आवश्यक सुधार बताती है, जबकि आलोचक इसे सुरक्षा एवं जवाबदेही के दृष्टिकोण से चिंताजनक मानते हैं।

पृष्ठभूमि: भारत की परमाणु दायित्व व्यवस्था

भारत ने 2010 में CLNDA अधिनियम पारित किया था, जिसका उद्देश्य था:

  • परमाणु दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को मुआवजा सुनिश्चित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार को सक्षम बनाना।
  • इस अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी “प्रतिगमन का अधिकार (Right of Recourse)”, जिसके अंतर्गत यदि दुर्घटना उपकरण की खामी से हुई हो तो ऑपरेटर आपूर्तिकर्ता (Supplier) के विरुद्ध दावा कर सकता था।
  • साथ ही, धारा 46 पीड़ितों को अन्य नागरिक या आपराधिक कानूनों के तहत भी दावा करने की अनुमति देती थी।

शांति अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ

निजी क्षेत्र की भागीदारी

अब निजी कंपनियों को परमाणु संयंत्रों के संचालन की अनुमति दी गई है। इससे पहले यह क्षेत्र मुख्यतः न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के अधीन था।

दायित्व ढाँचे में परिवर्तन

  • • आपूर्तिकर्ताओं को दायित्व से मुक्त किया गया।
  • • प्रतिगमन का अधिकार समाप्त।
  • • ऑपरेटर की दायित्व सीमा ₹100 करोड़ (छोटे संयंत्र) से ₹3,000 करोड़ (बड़े संयंत्र) तक।
  • • कुल दायित्व सीमा 300 मिलियन SDR (~₹3,900 करोड़)।
  • • धारा 46 हटाई गई, जिससे अन्य कानूनी उपाय सीमित हो गए।

यह ढाँचा अंतरराष्ट्रीय पूरक क्षतिपूर्ति सम्मेलन (CSC) के अनुरूप है, जो आपूर्तिकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करता है।

 

ऐतिहासिक दुर्घटनाएँ और दायित्व का प्रश्न

विश्व की प्रमुख दुर्घटनाएँ दर्शाती हैं कि डिजाइन दोषों ने बड़ी भूमिका निभाई:

  • थ्री माइल आइलैंड (1979) – नियंत्रण कक्ष की डिजाइन त्रुटियाँ।
  • चेर्नोबिल (1986) – रिएक्टर की तकनीकी खामियाँ।
  • फुकुशिमा (2011) – कंटेनमेंट संरचना की कमजोरी।

ऐसे में आपूर्तिकर्ता दायित्व हटाना “मोरल हैज़र्ड” उत्पन्न कर सकता है।

दायित्व सीमा बनाम संभावित क्षति

  • फुकुशिमा अनुमानित क्षति: ₹46 लाख करोड़।
  • चेर्नोबिल (बेलारूस): ₹21 लाख करोड़।
  • शांति अधिनियम दायित्व सीमा: ~₹3,900 करोड़।

यह संभावित वास्तविक क्षति की तुलना में अत्यंत कम है।

पूर्ण दायित्व सिद्धांत से विचलन

  • भारत ने ओलियम गैस रिसाव मामला (1987) में “पूर्ण दायित्व” सिद्धांत स्थापित किया था, जिसके अंतर्गत कोई अपवाद स्वीकार्य नहीं।
  • नया अधिनियम प्राकृतिक आपदा की स्थिति में ऑपरेटर को आंशिक संरक्षण देता है, जिससे सुरक्षा प्रोत्साहन कम हो सकता है।

भारत में परमाणु ऊर्जा का महत्व

  • कुल विद्युत उत्पादन में हिस्सा: लगभग 3%।
  • 2000 लक्ष्य: 10 GW (वास्तविक 2.86 GW)।
  • 2020 लक्ष्य: 20 GW (वास्तविक 6.78 GW)।
  • 2047 लक्ष्य: 100 GW (महत्त्वाकांक्षी)।

छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) अभी व्यावसायिक रूप से परखे नहीं गए हैं।

 

निष्कर्ष

शांति अधिनियम भारत की परमाणु नीति में निवेश-उन्मुख दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है। किंतु इसके साथ सुरक्षा, दायित्व संतुलन और नियामक स्वतंत्रता के प्रश्न जुड़े हैं।

यह विषय शासन, पर्यावरण न्यायशास्त्र, आपदा प्रबंधन तथा आर्थिक नीति—सभी के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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