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क्रिटिकल मिनरल्स मंत्रिस्तरीय सम्मेलन – भारतीय परिप्रेक्ष्य

Thu 05 Feb, 2026

संदर्भ

हाल ही में अमेरिका में आयोजित क्रिटिकल मिनरल्स मंत्रिस्तरीय सम्मेलन वैश्विक स्तर पर रणनीतिक खनिजों की आपूर्ति शृंखला से जुड़ी कमजोरियों को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इस सम्मेलन की मेज़बानी मार्को रूबियो ने संयुक्त राज्य अमेरिका का विदेश विभाग में की। इसमें 50 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडलों तथा यूरोपीय आयोग ने भाग लिया। सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य चीन-प्रधान बाज़ारों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और विविध, सुरक्षित तथा टिकाऊ आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करना था। भारत के लिए यह सम्मेलन आर्थिक सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और भू-राजनीति के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

क्रिटिकल मिनरल्स क्या हैं और इनका महत्व

  • क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकल, दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ), ग्रेफाइट और तांबा आधुनिक तकनीकों की रीढ़ हैं।
  • इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), सौर एवं पवन ऊर्जा, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, अर्धचालक (सेमीकंडक्टर), रक्षा प्रणालियों और उन्नत बैटरी तकनीकों में होता है। इन खनिजों की आपूर्ति में बाधा या बाज़ार का अत्यधिक केंद्रीकरण औद्योगिक विकास को धीमा कर सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

वैश्विक संदर्भ और चीन कारक

  • वर्तमान में चीन कई क्रिटिकल मिनरल्स के खनन, प्रसंस्करण, परिष्करण और विनिर्माण चरणों में प्रमुख भूमिका निभाता है। इससे आपूर्ति में झटके, निर्यात नियंत्रण और कीमतों में अस्थिरता का जोखिम बढ़ता है। सम्मेलन में सोर्स का विविधीकरण, फ्रेंड-शोरिंग, पारदर्शी बाज़ार, पर्यावरण एवं सामाजिक मानकों तथा चीन से इतर प्रसंस्करण क्षमताओं के विकास पर जोर दिया गया।

भारत के रणनीतिक हित

  • भारत की विकास यात्रा—मेक इन इंडिया, विकसित भारत, ऊर्जा संक्रमण लक्ष्य और डिजिटल विनिर्माण—क्रिटिकल मिनरल्स की सुनिश्चित उपलब्धता पर निर्भर है।
  • भारत में ईवी अपनाने, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में तेज़ी आ रही है। लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ प्रसंस्करण में आयात-निर्भरता भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यह सम्मेलन भारत के लिए वैश्विक साझेदारियों को सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करता है।

नीतिगत संरेखण और घरेलू पहल

  • भारत ने क्रिटिकल मिनरल्स की पहचान कर अन्वेषण, खनन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने हेतु नीतिगत सुधार शुरू किए हैं।
  • खनिज ब्लॉकों की नीलामी, नियामकीय सरलीकरण और रीसाइक्लिंग/अर्बन माइनिंग पर फोकस इस दिशा में कदम हैं। अंतरराष्ट्रीय सहयोग—तकनीक हस्तांतरण, संयुक्त उद्यम और दीर्घकालिक ऑफटेक समझौते—भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है।

भू-राजनीतिक और रणनीतिक आयाम

  • क्रिटिकल मिनरल्स अब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषय बन चुके हैं। रक्षा विनिर्माण, अंतरिक्ष कार्यक्रम और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए निर्बाध आपूर्ति आवश्यक है।
  • वैश्विक मंचों पर सक्रिय भागीदारी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करती है और एकल-देश निर्भरता घटाती है। साथ ही, सम्मेलन में सतत खनन, समुदाय संरक्षण और पर्यावरणीय मानकों पर जोर भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं से मेल खाता है।

भारत के लिए अवसर

  1. आपूर्ति का विविधीकरण: विदेशी खदानों में निवेश और दीर्घकालिक अनुबंध।
  2. प्रसंस्करण हब बनने की क्षमता: औद्योगिक आधार का उपयोग कर परिष्करण क्षमता विकसित करना।
  3. प्रौद्योगिकी साझेदारी: बैटरी, रीसाइक्लिंग और विकल्पों पर सहयोग।
  4. वैश्विक मानक निर्धारण: पारदर्शिता और सततता के मानकों में योगदान।
  5. कौशल और रोजगार: उच्च-मूल्य रोजगार सृजन।

चुनौतियाँ

  • नियामकीय विलंब, पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ, वित्तपोषण और तकनीकी अंतराल प्रमुख बाधाएँ हैं। प्रसंस्करण क्षमता पूंजी-सघन है और स्थिर नीतिगत संकेतों की आवश्यकता है। केंद्र–राज्य समन्वय निर्णायक होगा।

निष्कर्ष

  • क्रिटिकल मिनरल्स मंत्रिस्तरीय सम्मेलन सुरक्षित और लचीली आपूर्ति शृंखलाओं की ओर वैश्विक बदलाव को रेखांकित करता है। भारत के लिए यह कूटनीति, नीति सुधार और उद्योग सहयोग को जोड़कर रणनीतिक जोखिम घटाने और स्वच्छ ऊर्जा व विनिर्माण लक्ष्यों को तेज़ करने का अवसर है।
  • सही क्रियान्वयन के साथ भारत इस वैश्विक पहल को दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ में बदल सकता है।

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