मासिक धर्म स्वास्थ्य—अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार
 
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मासिक धर्म स्वास्थ्य—अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार

Sat 31 Jan, 2026

पृष्ठभूमि

  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया कि विद्यालयों में मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (Menstrual Hygiene Management–MHM) तक पहुंच, संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है।
  • यह निर्णय डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में दिया गया, जिसमें देशभर के विद्यालयों में MHM सुविधाओं की कमी को चुनौती दी गई थी।
  • न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने माना कि मासिक धर्म से जुड़ी सुविधाओं का अभाव किशोरियों को कलंक, अपमान और सामाजिक बहिष्कार का शिकार बनाता है, जो गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

 

संवैधानिक और विधिक महत्व

  • यह फैसला अनुच्छेद 21 की व्याख्या को और व्यापक बनाता है, जिसमें न्यायालय ने गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता (bodily autonomy) को केंद्रीय तत्व माना।
  • न्यायालय ने कहा कि गरिमा कोई सैद्धांतिक अवधारणा नहीं है, बल्कि इसे ऐसे हालातों में व्यक्त होना चाहिए जहाँ व्यक्ति बिना अपमान और पीड़ा के जीवन जी सके।
  • इसके साथ ही, न्यायालय ने इस मुद्दे को अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) से भी जोड़ा। अदालत ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म से जुड़ी गरीबी और सुविधाओं का अभाव, लड़कियों के लिए लिंग-विशिष्ट बाधा बनता है, जिससे उनकी शैक्षणिक निरंतरता प्रभावित होती है। यह स्थिति उन्हें शिक्षा और गरिमा के बीच चयन करने को मजबूर करती है, जो न्यायसंगत नहीं है।

 

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सुरक्षित और स्वच्छ MHM सुविधाओं के अभाव में:

  • कई किशोरियाँ विद्यालय से अनुपस्थित रहने को मजबूर होती हैं, या
  • असुरक्षित और अस्वस्थ प्रथाओं को अपनाती हैं।

दोनों ही स्थितियाँ उनकी शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का उल्लंघन करती हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि मासिक धर्म से जुड़ी गरीबी लड़कियों को उन छात्रों के समान अवसर से वंचित करती है, जो सैनिटरी उत्पाद वहन कर सकते हैं। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में बाधा के दीर्घकालिक और गंभीर परिणाम होते हैं।

 

सर्वोच्च न्यायालय के अनिवार्य निर्देश

न्यायालय ने देशव्यापी और बाध्यकारी निर्देश जारी किए, जो सरकारी और निजी—दोनों प्रकार के विद्यालयों, तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों पर लागू होंगे:

1. आधारभूत संरचना

    • सभी विद्यालयों में कार्यात्मक, लिंग-आधारित पृथक शौचालय।
    • पानी की उपलब्धता और स्वच्छ निपटान तंत्र।

2. सैनिटरी उत्पादों की उपलब्धता

    • निःशुल्क ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन।
    • प्राथमिकता से शौचालय परिसर में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन के माध्यम से उपलब्धता।

3. ‘MHM कॉर्नर’ की स्थापना

    • प्रत्येक विद्यालय में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर।
    • इनमें अतिरिक्त अंतर्वस्त्र, यूनिफॉर्म, डिस्पोज़ेबल बैग और आवश्यक सामग्री शामिल हों।

4. RTE अधिनियम के अंतर्गत जवाबदेही

    • सरकारी विद्यालयों के लिए धारा 19, RTE अधिनियम के अंतर्गत राज्य की जवाबदेही।
    • निजी विद्यालयों के लिए मान्यता रद्द करने सहित दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान।

 

‘मासिक धर्म में पुरुषों की भूमिका’

एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाते हुए न्यायालय ने पुरुष शिक्षकों और छात्रों को मासिक धर्म के जैविक तथ्य के प्रति संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इससे विद्यालयों में:

  • उत्पीड़न,
  • असंवेदनशील प्रश्न,
  • या अपमानजनक व्यवहार

को रोका जा सकेगा। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि केवल बुनियादी ढांचा ही नहीं, बल्कि मानसिकता में बदलाव भी आवश्यक है।

 

व्यापक प्रभाव और निष्कर्ष

यह निर्णय कल्याणकारी नीति से आगे बढ़कर अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को स्थापित करता है। यह लैंगिक न्याय, समावेशी शिक्षा, और SDG-4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) एवं SDG-5 (लैंगिक समानता) के अनुरूप है।

अंततः, सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मासिक धर्म से जुड़ी गरिमा कोई सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है, और शिक्षा व्यवस्था को जैविक वास्तविकताओं के अनुरूप ढलना होगा, न कि उन्हें दंडित करना होगा।

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