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RBI की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी

Thu 22 Jan, 2026

संदर्भ

  • मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, RBI ने सुझाव दिया है कि BRICS देशों की CBDCs को भारत की डिजिटल रुपया (CBDC) से जोड़ने का प्रस्ताव 2026 BRICS शिखर सम्मेलन के एजेंडे में रखा जाए—जिसकी मेज़बानी भारत करेगा।
  • यह संकेत देता है कि भारत CBDC को अब केवल घरेलू प्रयोग नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग के उपकरण के रूप में देख रहा है। यह दिशा G-20 अध्यक्षता (2023) के दौरान क्रिप्टो/डिजिटल वित्त पर मानकीकरण और सहयोग की भारत की पहल की स्वाभाविक अगली कड़ी है।

RBI: क्रिप्टो पर सख़्त, CBDC पर प्रगतिशील—क्यों?

RBI निजी क्रिप्टोकरेंसी को लेकर लंबे समय से सावधान और आलोचनात्मक रहा है—कारण स्पष्ट हैं:

  • अत्यधिक मूल्य अस्थिरता
  • धोखाधड़ी और बाज़ार में हेरफेर
  • आंतरिक मूल्य का अभाव
  • मौद्रिक/वित्तीय स्थिरता पर जोखिम

इसके विपरीत, RBI CBDC का समर्थन करता है क्योंकि यहाँ तकनीक (ब्लॉकचेन) को संप्रभु, विनियमित ढाँचे में अपनाया जाता है। अंतर स्पष्ट है:

  • CBDC संप्रभु गारंटी के साथ वैध मुद्रा है
  • ब्याज-रहित होने से बैंकिंग प्रणाली पर दबाव नहीं डालती
  • सट्टेबाज़ी को प्रोत्साहित नहीं करती

घरेलू स्तर पर CBDC की ज़रूरत कितनी?

  • भारत के पास पहले से Unified Payments Interface (UPI) जैसा विश्व-स्तरीय, तेज़, सस्ता और समावेशी भुगतान तंत्र है। UPI की विशाल बढ़त के सामने रिटेल CBDC के लिए घरेलू उपयोग-क्षेत्र सीमित दिखता है।
  • यही कारण है कि RBI की रणनीति घरेलू प्रतिस्थापन से हटकर सीमापार (cross-border) उपयोग की ओर मुड़ती दिखती है—जहाँ वास्तविक मूल्य-वृद्धि संभव है।

सीमापार भुगतान: असली अवसर

अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था अक्सर:

  • धीमी और महँगी
  • अपारदर्शी
  • काले धन/मनी-लॉन्ड्रिंग के लिए संवेदनशील

आज भी बहुत-सी लेन-देन SWIFT जैसे विरासत नेटवर्क पर निर्भर हैं, जो भू-राजनीतिक प्रभावों से मुक्त नहीं।

ब्लॉकचेन-आधारित CBDC यहाँ गेम-चेंजर बन सकती है:

  • पारदर्शी और अपरिवर्तनीय लेन-देन रिकॉर्ड
  • प्रोग्रामेबल अनुपालन (उत्पत्ति-गंतव्य, कर/आईडी लिंक)
  • कम मध्यस्थ, तेज़ निपटान

यदि BRICS स्तर पर ढाँचा बने, तो राष्ट्रीय पहचान/कर प्रणालियों से लिंक अनिवार्य कर अवैध वित्त पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।

BRICS क्यों महत्वपूर्ण है?

BRICS-जुड़ा CBDC ढाँचा केवल दक्षता नहीं, रणनीतिक विकल्प भी है। भारत के लिए इसके लाभ:

  • रूस/ईरान जैसे देशों के साथ भुगतान सरल (जहाँ SWIFT सीमित)
  • कुछ क्षेत्रों में डॉलर-निर्भरता में कमी
  • दक्षिण-दक्षिण वित्तीय सहयोग को बल

पर जोखिम भी हैं। डॉलर-केंद्रित व्यवस्था से दूरी पर भू-राजनीतिक प्रतिक्रिया संभव है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पहले ही BRICS के डी-डॉलराइजेशन प्रयासों पर अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी दे चुके हैं। भारत को तौलना होगा—अल्पकालिक दबाव बनाम दीर्घकालिक भुगतान-स्वायत्तता।

क्या RBI का रास्ता संतुलित है?

RBI का दृष्टिकोण कैलिब्रेटेड प्रैग्मैटिज़्म दर्शाता है:

  • तकनीक को पूरी तरह नकारना नहीं
  • अनियंत्रित क्रिप्टो-अराजकता को अपनाना नहीं
  • जहाँ प्रणालीगत लाभ हो, वहीं नवाचार

निष्कर्ष

  • CBDC केवल डिजिटल पैसा नहीं; यह भुगतान रेलों के नियंत्रण का प्रश्न है। BRICS के भीतर CBDC-लिंक से पारदर्शिता, लागत-कमी और वित्तीय संप्रभुता बढ़ सकती है—बशर्ते भू-राजनीतिक जोखिमों का विवेकपूर्ण प्रबंधन हो।

BRICS

  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह
  • मूल सदस्य: ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन
  • दक्षिण अफ्रीका: 2010
  • नए सदस्य (2024 से): मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE
  • इंडोनेशिया: जनवरी 2025
  • प्रमुख क्षेत्र:
    • वित्तीय सहयोग, डी-डॉलराइजेशन
    • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB)
    • तकनीक व डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर
    • 2026 BRICS शिखर सम्मेलन: भारत में

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