21 January, 2026
उच्च सागरीय संधि
Mon 19 Jan, 2026
उच्च सागरीय संधि (High Seas Treaty / BBNJ Agreement), जिसे औपचारिक रूप से राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र से परे जैव-विविधता पर समझौता (BBNJ Agreement) कहा जाता है, वैश्विक समुद्री शासन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में समुद्री जैव-विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए बनाया गया विश्व का पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है। यह संधि 17 जनवरी 2026 को औपचारिक रूप से प्रवर्तन में आ गई, जिससे वैश्विक महासागरों के लगभग दो-तिहाई भाग के लिए एक नया नियामक ढांचा स्थापित हुआ।
प्रवर्तन और वैश्विक स्वीकृति
- संधि के प्रवर्तन के समय तक 83 देशों ने इसे अनुमोदित (Ratify) कर दिया था। इनमें चीन, जापान, फ्रांस और ब्राज़ील जैसे प्रमुख समुद्री और आर्थिक शक्तियाँ शामिल हैं। यह व्यापक अनुमोदन इस बात को दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को एक साझा वैश्विक जिम्मेदारी के रूप में देख रहा है।
- भारत ने इस समझौते पर वर्ष 2024 में हस्ताक्षर किए थे, जो बहुपक्षीय समुद्री शासन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, जनवरी 2026 तक भारत में औपचारिक अनुमोदन हेतु आवश्यक घरेलू विधायी प्रक्रिया लंबित है। इस कारण भारत अभी इस संधि का कानूनी रूप से बाध्यकारी पक्षकार नहीं बना है, हालांकि वह इसके उद्देश्यों का समर्थन करता है।
आवश्यकता और पृष्ठभूमि
- पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग महासागरों से ढका है, और इनमें से करीब दो-तिहाई क्षेत्र राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, यानी किसी भी देश के 200 समुद्री मील के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से परे। इन क्षेत्रों को ही उच्च सागरीय क्षेत्र कहा जाता है।
- हालाँकि संयुक्त राष्ट्र समुद्री क़ानून सम्मेलन (UNCLOS) महासागरों के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में जैव-विविधता संरक्षण के लिए ठोस और बाध्यकारी प्रावधानों से रहित था। इसके परिणामस्वरूप ये क्षेत्र अत्यधिक मछली पकड़ने, गहरे समुद्र में खनन, प्रदूषण, महासागरीय अम्लीकरण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे थे। इसी कानूनी रिक्तता को भरने के लिए BBNJ समझौते की आवश्यकता पड़ी।
उच्च सागरीय संधि के चार प्रमुख स्तंभ
1. समुद्री आनुवंशिक संसाधन (Marine Genetic Resources – MGRs): इस संधि के तहत यह व्यवस्था की गई है कि हाई सीज़ से प्राप्त आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों का न्यायसंगत और समान वितरण किया जाएगा, जिससे विकासशील देशों के हित सुरक्षित रह सकें।
2. क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण: संधि पहली बार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas – MPAs) स्थापित करने का प्रावधान करती है, जिससे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों और प्रवासी प्रजातियों का संरक्षण संभव होगा।
3. पर्यावरण प्रभाव आकलन: ऐसी सभी गतिविधियों के लिए पूर्व पर्यावरण प्रभाव आकलन अनिवार्य किया गया है, जो समुद्री पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं। यह सावधानी और रोकथाम सिद्धांत को मजबूत करता है।
4. क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: विकासशील और अल्प-विकसित देशों को समुद्री विज्ञान, तकनीक और संस्थागत क्षमता उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया है, ताकि वे वैश्विक महासागरीय शासन में प्रभावी भूमिका निभा सकें।
भारत के लिए महत्व
भारत के संदर्भ में, इस संधि का महत्व बहुआयामी है। इसके अनुमोदन से:
- भारत की ब्लू इकोनॉमी रणनीति को मजबूती मिलेगी
- SDG-14 (जल के नीचे जीवन) के लक्ष्यों को समर्थन मिलेगा
- भारत वैश्विक महासागरीय निर्णय-निर्माण में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकेगा
हालाँकि, अनुमोदन से पहले भारत को अपने समुद्री, पर्यावरणीय और जैव-विविधता कानूनों को इस संधि के अनुरूप ढालना होगा।
निष्कर्ष
- 17 जनवरी 2026 को प्रवर्तन में आई हाई सीज़ संधि वैश्विक साझा संसाधनों (Global Commons) के शासन में एक मील का पत्थर है।
- यह संधि शक्ति-आधारित महासागरीय उपयोग के स्थान पर जिम्मेदारी, न्याय और सततता को केंद्र में रखती है। 83 देशों द्वारा अनुमोदन के साथ इसकी वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है। आने वाले समय में इसकी सफलता प्रभावी कार्यान्वयन, वैज्ञानिक सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी।
संबंधित प्रमुख तथ्य एवं शब्दावली
| शब्द / अवधारणा | व्याख्या |
| UNCLOS | संयुक्त राष्ट्र समुद्री क़ानून सम्मेलन, जो महासागरों के उपयोग और शासन का वैश्विक कानूनी ढांचा प्रदान करता है |
| समुद्री आनुवंशिक संसाधन (MGRs) | समुद्री जीवों से प्राप्त आनुवंशिक सामग्री, जिसका वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक महत्व होता है |
| क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण (ABMTs) | जैव-विविधता संरक्षण हेतु अपनाए जाने वाले उपकरण, जैसे समुद्री संरक्षित क्षेत्र |
| समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPAs) | समुद्री जैव-विविधता के संरक्षण के लिए चिन्हित और संरक्षित क्षेत्र |
| पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) | प्रस्तावित गतिविधियों के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का पूर्व मूल्यांकन करने की प्रक्रिया |
| सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) | पर्यावरणीय अनिश्चितता की स्थिति में संभावित क्षति को रोकने हेतु अग्रिम कार्रवाई का सिद्धांत |
| क्षमता निर्माण (Capacity Building) | विकासशील देशों की संस्थागत, तकनीकी और मानव संसाधन क्षमताओं का सुदृढ़ीकरण |
| प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) | समुद्री विज्ञान एवं तकनीकी उपकरणों का देशों के बीच साझा किया जाना |
| वैश्विक साझा संसाधन (Global Commons) | ऐसे संसाधन जो किसी एक देश के नियंत्रण में नहीं होते, जैसे महासागर, वायुमंडल और अंटार्कटिका |
| SDG-14 | संयुक्त राष्ट्र का सतत विकास लक्ष्य – जल के नीचे जीवन (Life Below Water) |
| 30×30 लक्ष्य | वर्ष 2030 तक पृथ्वी के 30% स्थलीय एवं समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण का वैश्विक लक्ष्य |









