09 February, 2026
प्रथम पूर्ण डिजिटल जनगणना
Tue 16 Dec, 2025
संदर्भ :
- कैबिनेट ने भारत की 16वीं जनगणना (Census of India 2027) के लिए ₹11,718.24 करोड़ का बजट मंजूर किया, जो पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना होगी।
मुख्य बिन्दु :
- बजट: ₹11,718.24 करोड़
- प्रकृति: पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना
- उद्देश्य: डेटा को तेज़ी से, सुरक्षित और अधिक विश्वसनीय तरीके से एकत्र करना, और नीतियों के निर्माण के लिए ग्राम/वार्ड स्तर तक सटीक डेटा प्रदान करना।
जनगणना 2027 को दो प्रमुख चरणों में आयोजित किया जाएगा:
- हाउसलिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना (अप्रैल-सितंबर 2026): इस चरण में मकानों और रहन-सहन की स्थिति की जानकारी ली जाएगी।
- जनसंख्या गणना (फरवरी 2027): इस चरण में प्रत्येक नागरिक की उम्र, लिंग, शिक्षा, जाति, भाषा, रोजगार आदि से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी
- प्रथम चरण में चार राज्यों में : उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर
- जनगणना, रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के कार्यालय द्वारा की जाती है। यह केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आता है।
- 2027 की जनगणना, 1872 के बाद से 16वीं और स्वतंत्रता के बाद से आठवीं जनगणना होगी।
- सरकार ने आगामी जनगणना, जातिवार गणना और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR) के आंकड़े एक साथ जुटाने का फैसला किया है
प्रमुख डिजिटल और तकनीकी नवाचार :
- डेटा संग्रह: गणना कर्मचारी (Enumerators) पारंपरिक कागजी फॉर्म के बजाय अपने स्मार्टफोन (Android और iOS दोनों) पर मोबाइल एप्लीकेशन का उपयोग करके डेटा एकत्र करेंगे।
- स्व-गणना (Self-Enumeration): जनता को एक समर्पित डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपनी जानकारी स्वयं दर्ज करने का विकल्प दिया जाएगा।
- मॉनिटरिंग पोर्टल: संपूर्ण प्रक्रिया की वास्तविक समय (Real-Time) पर निगरानी के लिए जनगणना प्रबंधन और निगरानी प्रणाली (CMMS) नामक एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया गया है।
- मैप एप्लीकेशन: चार्ज अधिकारियों द्वारा हाउस लिस्टिंग ब्लॉकों को व्यवस्थित करने के लिए एचएलबी क्रिएटर (HLB Creator) वेब मैप एप्लीकेशन का उपयोग किया जाएगा।
- सुरक्षा: इस बड़े पैमाने के डिजिटल ऑपरेशन के लिए उपयुक्त सुरक्षा सुविधाएँ सुनिश्चित की गई हैं।
जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली (Census Management and Monitoring System – CMMS)
- उद्देश्य : जनगणना से संबंधित सभी गतिविधियों की निगरानी, प्रबंधन एवं समन्वय के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल प्रदान करना
- विकास : यह प्रणाली भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त (RGI & Census Commissioner), भारत सरकार के कार्यालय द्वारा विकसित की गई है।
प्रमुख विशेषताएँ :
- प्रगणकों (Enumerators) एवं पर्यवेक्षकों (Supervisors) के लिए कार्य प्रगति की रीयल-टाइम निगरानी।
- डैशबोर्ड आधारित प्रणाली, जिससे डाटा संग्रह की गुणवत्ता एवं समयबद्धता सुनिश्चित होती है।
- बहुभाषीय जानकारी एवं प्रशिक्षण सामग्री की उपलब्धता।
- डाटा संग्रह ब्लॉकों (Enumeration Blocks) की स्थिति एवं प्रगति को ट्रैक करने की सुविधा
- उपयोग : प्रगणकों, पर्यवेक्षकों एवं प्रशासकों को प्रशिक्षण, डाटा सत्यापन तथा प्रक्रिया प्रबंधन में सहायता प्रदान करना
महत्व :
- डिजिटल परिवर्तन: भारत की पहली डिजिटल जनगणना को सफल बनाने में यह प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा कागजी कार्यप्रणाली को कम करती है।
- प्रशिक्षण: प्रगणकों के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य-स्तरीय प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से प्रभावी सहयोग प्रदान करती है।
- डाटा सुरक्षा: डाटा की गोपनीयता सुनिश्चित की जाती है; किसी भी तृतीय-पक्ष के साथ डाटा साझा नहीं किया जाता।
- प्रभाव : नीति निर्माण, परिसीमन (Delimitation) तथा सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए सटीक, विश्वसनीय एवं समयबद्ध डाटा उपलब्ध कराना
भारत में परिसीमन
परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित किया जाता है। इसका मौलिक सिद्धांत 'एक मत, एक मूल्य' सुनिश्चित करना है, ताकि जनसंख्या के प्रत्येक खंड को विधायिका में समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके।
संवैधानिक आधार और इतिहास :
| अनुच्छेद 82 | संसद को यह अधिकार देता है कि वह प्रत्येक जनगणना के पूरा होने के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाए। |
| अनुच्छेद 170 | यह राज्यों को परिसीमन अधिनियम के अनुसार, प्रत्येक जनगणना के बाद, क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित करने का निर्देश देता है। |
- भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है, जो 'परिसीमन आयोग अधिनियम' (1952) के तहत स्थापित हुए।
- ये कार्य 1952, 1963, 1973 और 2002 में गठित आयोगों द्वारा सम्पन्न किए गए हैं।
परिसीमन आयोग की संरचना और शक्तियाँ :
- अध्यक्ष: उच्चतम न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश।
- पदेन सदस्य: मुख्य चुनाव आयुक्त (या उनके द्वारा नामित अन्य चुनाव आयुक्त)।
- पदेन सदस्य: सम्बंधित राज्य के राज्य चुनाव आयुक्त।
सीटों का स्थगन (सीट फ्रीज) और संशोधन :
- 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976: इसने परिसीमन को वर्ष 2001 तक के लिए स्थगित कर दिया था।
- 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001: इस संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आँकड़ों के आधार पर वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक स्थिर (फ्रीज) कर दिया। इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित करना था, ताकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को स्वतः ही अधिक सीटें न मिलें।
- 87वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003: इस संशोधन ने क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (बाउंड्री एडजस्टमेंट) और युक्तिकरण के लिए वर्ष 2001 की जनगणना को आधार बनाया।
अंतिम परिसीमन कार्य (2002-2008) :
- वर्ष 2002 में गठित अंतिम परिसीमन आयोग ने जुलाई 2002 से 31 मार्च 2008 के मध्य अपना कार्य सम्पन्न किया।
- सीटों की संख्या: राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया गया (1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर)।
- कार्य: केवल मौजूदा लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को पुनः व्यवस्थित किया गया।
- आरक्षण: अनुसूचित जाति (SC) एवं अनुसूचित जनजाति (ST) सीटों की संख्या का पुनः परीक्षण और निर्धारण 2001 की जनगणना के अनुसार किया गया।
- अपवाद: इस अंतिम परिसीमन के तहत उत्तर-पूर्व के चार राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर व नागालैंड) को शामिल नहीं किया गया था।
परिसीमन के मुख्य उद्देश्य :
- समान प्रतिनिधित्व: जनसंख्या के समान खण्डों के लिए विधायिका में समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना।
- भौगोलिक निष्पक्षता: भौगोलिक क्षेत्रों का इस प्रकार उचित विभाजन करना कि किसी भी राजनीतिक दल या क्षेत्र को अनुचित लाभ न मिले।
- जनसंख्या नियंत्रण प्रोत्साहन: उन राज्यों को दंडित होने से रोकना जो जनसंख्या नियंत्रण उपायों को सफलतापूर्वक लागू करते हैं।
- आरक्षित सीटों का समायोजन: जनसंख्या के अनुपात में आरक्षित सीटों (SC/ST) की संख्या और स्थान को परिवर्तित करना।









