08 December, 2025
अनैच्छिक नार्को टेस्ट असंवैधानिक
Mon 15 Dec, 2025
संदर्भ
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि किसी भी व्यक्ति पर उसकी इच्छा के विरुद्ध (involuntary) नार्को टेस्ट करना असंवैधानिक है।
इसके साथ ही, कोर्ट ने अमलेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2025) में पटना उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें बिना सहमति के नार्को टेस्ट की अनुमति दी गई थी।
पृष्ठभूमि
- यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) को पुनः पुष्ट करता है और यह स्पष्ट करता है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर किसी व्यक्ति की मानसिक स्वतंत्रता, शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
- 2025 में पटना हाईकोर्ट ने आरोपी अमलेश कुमार पर बिना उसकी सहमति के नार्को विश्लेषण परीक्षण कराने की अनुमति दी थी।
- यह परीक्षण विशेष दवाओं (जैसे सोडियम पेंटोथल) के प्रयोग से व्यक्ति को अर्ध-बेहोशी की अवस्था में ले जाता है, जहाँ वह अनियंत्रित रूप से सवालों के उत्तर दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में तीन मुख्य प्रश्न थे:
- क्या बिना सहमति के इस प्रकार का परीक्षण किया जा सकता है?
- क्या यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
- क्या हाईकोर्ट ने उनकी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है?
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा—
- अनैच्छिक नार्को टेस्ट, संविधान के अनुच्छेद 20(3) और 21 का उल्लंघन है।
- वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग ‘जबरदस्ती साक्ष्य निकालने’ के लिए नहीं किया जा सकता।
- यह मानसिक गोपनीयता (mental privacy) और शारीरिक स्वायत्तता (bodily autonomy) पर चोट है।
- किसी को स्वयं के विरुद्ध साक्षी बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
- जाँच एजेंसियाँ ‘जांच की सुविधा’ के नाम पर मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं कर सकतीं।
- किसी भी परीक्षण के लिए सहमति—स्वैच्छिक, सूचित और मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज—होनी जरूरी है।
नार्को टेस्ट असंवैधानिक क्यों माना गया?
(a) अनुच्छेद 20(3) – आत्म-अपराध स्वीकार करने के विरुद्ध अधिकार
- नार्को टेस्ट व्यक्ति की इच्छा को समाप्त कर देता है।
- इससे निकली जानकारी “बलपूर्वक दिया गया बयान” मानी जाएगी।
- इसलिए यह पूर्णतः असंवैधानिक है।
(b) अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- शरीर में जबरन रसायन डालना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आक्रमण है।
- यह व्यक्ति की गरिमा (dignity) और मानसिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
- प्रक्रिया चिकित्सकीय रूप से जोखिमपूर्ण है।
(c) मानसिक गोपनीयता का उल्लंघन (Right to Privacy – 2017)
- पुट्टस्वामी निर्णय (2017) ने मानसिक गोपनीयता को भी मौलिक अधिकार माना।
- नार्को टेस्ट व्यक्ति के विचारों में जबरन हस्तक्षेप करता है।
संवैधानिक परिदृश्य
| अनुच्छेद | व्यवस्था | नार्को टेस्ट से संबंध |
| 20(3) | आरोपी को स्वयं के विरुद्ध साक्षी बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता | जबरन नार्को टेस्ट = बाध्य साक्ष्य |
| 21 | जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता | शारीरिक व मानसिक जबरदस्ती का उल्लंघन |
| 22 | गिरफ्तारी प्रक्रिया में सुरक्षा | बलपूर्वक परीक्षण करना सुरक्षा का उल्लंघन |
| 14 | समानता का अधिकार | मनमाना निर्णय = अनुचित प्रक्रिया |
निर्णय का व्यापक प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव
- नागरिक स्वतंत्रता और मानव गरिमा को मजबूत करता है।
- पुलिस द्वारा वैज्ञानिक तकनीकों के दुरुपयोग पर रोक।
- न्यायपालिका द्वारा मौलिक अधिकारों की पुनः पुष्टि।
संभावित चुनौतियाँ
- जटिल अपराधों की जाँच में देरी हो सकती है।
- पुलिस इसे जांच में बाधा मान सकती है।
- अपराध-जाँच और मानवाधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न बना रहेगा।
फिर भी, सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट है—कानून-व्यवस्था, संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।
निष्कर्ष
- यह निर्णय नागरिक अधिकारों, मानसिक गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि नार्को टेस्ट केवल स्वैच्छिक रूप से ही किया जा सकता है, और किसी को भी इस प्रकार की प्रक्रिया के लिए मजबूर करना भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
- यह फैसला मानव अधिकार, पुलिसिंग और न्यायिक नैतिकता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।









